कटनीमध्य प्रदेश

यशभारत दशहरा विशेष : मैसूर के दशहरे से प्रभावित होकर लल्लू भैया ने शुरू कराई परम्परा, कटनी में 9 दशक पुराना है दशहरे का अतीत

कटनी, यशभारत। कटनी में आदिशक्ति मां जगदम्बे की प्रतिमाओं की स्थापना का सिलसिला वर्ष 1937 से शुरू हुआ, जबकि सन 1884 से गोलबाजार में रामलीला के मंचन का सिलसिला शुरू हो चुका था और 1929 के आसपास स्व. रामदास अग्रवाल (लल्लू भैया) इसकी कमान भी संभाल चुके थे, तब कटनी में विजयादशमी पर्व पर चल समारोह आयोजित करने की परम्परा नहीं थी। स्व. लल्लू भैया ने समूचे शहर को इस धार्मिक और सांस्कृतिक पर्व से जोडऩे के उद्देश्य से 1937 में अपने बाड़े में मां भवानी की स्थापना का सिलसिला शुरू किया। अब शहर के दुर्गोत्सव व दशहरा ने पूरे प्रदेश में अपनी एक अलग पहचान बनाई है।
जानकारी के मुताबिक अल्र्फटगंज स्थित लल्लू भैया के पुराने निवास पर मां जगदम्बे की विधि-विधान से स्थापना की गई। दशहरे के दिन मां भवानी की प्रतिमा का विसर्जन जुलूस समिति के लोगों ने धूमधाम से निकाला, इसमें गोलबाजार रामलीला कमेटी के लोग भी सम्मिलित हुए। धीरे-धीरे यह सिलसिला बढ़ता गया। अगले वर्षों में लल्लू भैया ने कुछ और स्थानों पर प्रतिमाएं स्थापित कराईं। करीब एक दशक बाद प्रतिमाओं की संख्या भी दर्जनों में हो गई। समय गुजरता गया। नई पीढ़ी अपने गौरवमयी अतीत से प्रभावित होकर इस परम्परा से जुड़ती चली गई। साल-दर-साल साज-सजावट में भी रौनक आती गई। दुर्गा उत्सव समितियों के बीच होड़ के चलते शहर दुल्हन की तरह सजने लगा। 1970 और 1980 के दशक तक प्रतिमाएं सैकड़े का आंकड़ा पार कर चुकी थीं और पिछले 10 वर्षों में तो तीन सैकड़े के आसपास दुर्गा प्रतिमाओं की स्थापना की जाने लगी है। देवी स्थापना के साथ धार्मिक आयोजन भी बढ़े और सारा शहर भक्ति में रमने लगा। बुजुर्गों से हासिल जानकारी के मुताबिक पहले दशहरा जुलूस गोलबाजार रामलीला कमेटी के बैनर तले ही निकलता था, बाद में जब घंटाघर रामलीला कमेटी अलग हुई तो दशहरा जुलूस के नेतृत्व को लेकर भी खींचतान शुरू हुई। नतीजा यह निकला कि दुर्गा उत्सव कमेटियों के बीच भी बटवारा शुरू हो गया। कोई घंटाघर रामलीला के साथ शािमल होने लगा तो कोई गोलबाजार के साथ।
अकटनी के दशहरे की पूरे मध्यप्रदेश में अलग पहचान
कटनी में सांस्कृतिक रचनात्मकता एवं धार्मिक भावनाओं के उत्पे्ररक स्व. लल्लू भैया वर्षों गोलबाजार रामलीला के संरक्षक रहे। पहले दशहरे के समय छोटी सी रामलीला हुआ करती थी और लोग बड़े नगरों खासकर कलकत्ता, मैसूर के दशहरे की चर्चा किया करते थे। बुजुर्ग बताते हैं कि स्व. लल्लू भैया ने नगर में मां दुर्गा की प्रतिमाओं की स्थापना के लिए लोगों को प्रेरित किया और उनके अथक प्रयासों से पहला दशहरा चल समारोह जब शहर की सडक़ों से निकला तो धर्म का प्रवाह हो चला। स्व. लल्लू भैया द्वारा करीब 9 दशक पहले की गई इस शुरूआत ने अब एक परम्परा का रूप ले लिया है और अब कटनी का दुर्गोत्सव और दशहरा पर्व न केवल मध्यप्रदेश बल्कि पूरे देश में अपनी एक अलग पहचान रखता है। कटनी के साथ ही कैमोर नगर में ऐतिहासिक दशहरा महोत्सव आयोजित किया जाता है, जहां रावण के विशाल पुतले का दहन होता है।
ड्रम और पीपे से बनता था रामलीला का स्टेज
बताया जाता है कि करीब 60 वर्ष पहले घंटाघर में स्टेज नहीं था, सिर्फ खाली मैदान था। उस समय ड्रम और पीपे का स्टेज बनाकर रामलीला कराई जाती थी। 1978 में घंटाघर रामलीला कमेटी का विस्तार हुआ। अब हर साल यहां रामलीला का मंचन होता है। कलाकारों द्वारा एक से बढक़र संवाद प्रस्तुत किए जाते हैं।Screenshot 20241012 132141 WhatsApp2

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