फ्लॉप शो साबित हुआ रीठी का जन कल्याण शिविर, पुरूषों ने नहीं दिखाई रूचि, महिलाओं की रही अधिक भागीदारी, जनपद पंचायत की भूमिका पर उठे सवाल

कटनी/रीठी, यशभारत। जनपद पंचायत रीठी में आयोजित जन कल्याण शिविर का उद्देश्य शासन की जनहितकारी योजनाओं को आमजन तक पहुंचाना है लेकिन शिविर की वास्तविक तस्वीर ने कई सवाल खड़े कर दिए। कार्यक्रम स्थल पर मौजूद लोगों के अनुसार शिविर में महिलाओं उपस्थिति अधिक और पुरुषों की कम रही। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब किसी आयोजन में समाज के एक बड़े वर्ग की सहभागिता नगण्य हो, तो क्या उसे जन कल्याण शिविर कहा जाना उचित है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि शिविर का लाभ सभी नागरिकों तक पहुंचाना था तो पुरुषों की भागीदारी इतनी कम क्यों रही। क्या जनप्रतिनिधियों और प्रशासन द्वारा पर्याप्त प्रचार प्रसार नहीं किया गया। क्या ग्रामीण क्षेत्रों तक इसकी जानकारी समय पर नहीं पहुंच सकी या फिर आयोजन की सूचना सीमित दायरे तक ही सिमटकर रह गई। जानकारों का कहना है कि यदि जनपद पंचायत स्तर पर इच्छाशक्ति दिखाई जाती तो प्रत्येक ग्राम पंचायत के सरपंच, सचिव, रोजगार सहायक एवं पंचायत कर्मियों के माध्यम से गांव-गांव मुनादी कराकर, सूचना पट्टों पर चस्पा कराकर तथा अन्य माध्यमों से व्यापक प्रचार-प्रसार सुनिश्चित किया जा सकता था। यदि ऐसा नहीं हुआ तो इसकी जवाबदेही किसकी तय होगी। लोगों के बीच यह चर्चा भी है कि आखिर ऐसी कौन सी परिस्थितियां रहीं, जिनके कारण बड़ी संख्या में पुरुष वर्ग इस शिविर से दूर रहा। यदि सूचना जन जन तक नहीं पहुंची तो क्या यह प्रशासनिक लापरवाही नहीं मानी जाएगी।
शासन की मंशा को लग रहा पलीता
विशेषज्ञों का कहना है कि शासन करोड़ों रुपये खर्च कर योजनाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने का दावा करता है। ऐसे में यदि पात्र हितग्राही जानकारी के अभाव में शिविरों तक नहीं पहुंच पाते तो इससे शासन की मंशा और योजनाओं की प्रभावशीलता दोनों प्रभावित होती हैं। जनकल्याण कार्यक्रमों का मूल उद्देश्य समावेशी भागीदारी होता है न कि किसी एक वर्ग तक सीमित रह जाना।
जांच और मूल्यांकन की मांग
नागरिकों ने मांग की है कि शिविर में वास्तविक उपस्थिति, प्रचार प्रसार की प्रक्रिया, सूचना प्रसारण के साधनों और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष समीक्षा की जाए। यदि प्रचार प्रसार में कोई कमी पाई जाती है तो जवाबदेही तय कर भविष्य में ऐसे आयोजनों को अधिक प्रभावी और सर्वसुलभ बनाने के लिए ठोस व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। जब नाम जन.कल्याण शिविर है तो क्या वास्तव में इसकी जानकारी और लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुंचा या फिर यह आयोजन सीमित भागीदारी के कारण अपने मूल उद्देश्य से भटक गया। यही प्रश्न अब क्षेत्र में चर्चा और चिंतन का विषय बना हुआ है।






