
जंगल के बीच पत्थरों का अद्भुत आश्चर्य
बरसात में ऊमरडोली का लाजवाब नज़ारा
पहाड़, पानी और सौ साल पुरानी इंजीनियरिंग…
इंट्रो 👇
अगर मानसून में दोस्तों के साथ ऐसी जगह
घूमने का मन हो, जहां झरने जैसा बहता पानी, पहाड़, जंगल और इतिहास—सब एक ही जगह मिल जाएं, तो ऊमरडोली एक शानदार ठिकाना हो सकता है। पत्थरों की अनूठी इंजीनियरिंग और बारिश में बदलता इसका रूप इसे आम पिकनिक स्पॉट से अलग बनाता है।
(यशभारत संडे स्पेशल)
कटनी, यशभारत। शहर की भागदौड़ से निकलकर जैसे-जैसे रास्ता जंगल की ओर बढ़ता है, मोबाइल की दुनिया पीछे छूटने लगती है। सड़क के दोनों तरफ पहाड़ियां, बारिश से धुले पेड़ और मिट्टी की सोंधी खुशबू सफर का मूड बदल देती है। करीब पहुंचते ही सामने पत्थरों की विशाल दीवार दिखाई देती है। यही है ऊमरडोली—एक ऐसी जगह, जहां प्रकृति और सौ साल पुरानी इंजीनियरिंग साथ नजर आती है।
मानसून में बदल जाता है पूरा नजारा
रीठी विकासखंड के लालपुरा गांव के समीप, बकलेहटा और चरगवां के बीच स्थित ऊमरडोली बारिश के मौसम में खास आकर्षण बन जाता है। पहाड़ियों से उतरता पानी जलाशय में पहुंचता है और बांध भरने पर दीवार के ऊपर से छलकने लगता है। नीचे गिरती पानी की धार दूर से किसी झरने जैसी नजर आती है।
बारिश, पानी की आवाज और चारों ओर फैला प्राकृतिक माहौल यहां कुछ देर रुकने का मन बनाता है। यही वजह है कि मानसून में ऊमरडोली दोस्तों और परिवार के साथ घूमने के लिए अलग अनुभव देता है।
सौ साल पुराना, लेकिन आज भी खास
ऊमरडोली सिर्फ घूमने की जगह नहीं, बल्कि पुरानी इंजीनियरिंग को करीब से देखने का मौका भी है। ब्रिटिश शासनकाल में वर्ष 1914 में इसके निर्माण की शुरुआत हुई थी और करीब दस वर्ष में यह पूरा हुआ।
दो पहाड़ियों को जोड़कर बनाई गई इसकी सर्पाकार आर्च संरचना इसकी सबसे खास पहचान है। इसकी बनावट पानी के दबाव को सीधे एक जगह पड़ने देने के बजाय उसे संरचना के घुमाव के जरिए फैलाने में मदद करती है।
करीब 25.75 लाख घन फीट पत्थरों से बनी यह संरचना लगभग 1520 फीट लंबी और 74 फीट ऊंची है। इसका जलग्रहण क्षेत्र करीब 14.4 वर्ग मील है। सौ साल से ज्यादा समय बाद भी यह संरचना मजबूती से खड़ी है, जो उस दौर के निर्माण कौशल को दिखाती है।
पिकनिक स्पॉट से कहीं ज्यादा
ऊमरडोली की खासियत सिर्फ फोटो और घूमने तक सीमित नहीं है। जलाशय में सालभर पानी बना रहता है और इससे निकलने वाली नहरों से आसपास के खेतों की सिंचाई होती है।
चरगवां, बकलेहटा, बरजी सहित आसपास के गांवों की करीब 397 हेक्टेयर कृषि भूमि को इससे पानी मिलता है। यानी बारिश में जहां यह जगह घूमने वालों को आकर्षित करती है, वहीं बाकी समय आसपास के किसानों के लिए पानी का महत्वपूर्ण स्रोत बनी रहती है।
यहां पहुंचना भी अपने आप में सफर
रीठी तहसील मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर की दूरी के बाद मुख्य मार्ग से लगभग तीन किलोमीटर रास्ता जंगल और पहाड़ी क्षेत्र से होकर गुजरता है। मानसून में यह सफर अपने आप में किसी छोटी एडवेंचर ट्रिप जैसा महसूस होता है।
रास्ते में बारिश से बदला जंगल, पहाड़ियों के बीच से गुजरता मार्ग और आसपास की शांति शहर से बिल्कुल अलग अनुभव देते हैं। हालांकि बरसात में रास्ते की स्थिति और फिसलन को देखते हुए वाहन चलाते समय सावधानी जरूरी है।
पर्यटन की सुविधाएं मिलें तो बढ़ेगा आकर्षण
इतनी खूबियों के बावजूद ऊमरडोली अभी व्यवस्थित पर्यटन स्थल के रूप में विकसित नहीं हो पाया है। पर्यटकों की सुविधा के लिए शेड, रेलिंग और पहुंच मार्ग में सुधार का प्रस्ताव सामने आया है।
पहले भी इसे पर्यटन से जोड़ने की पहल हुई है। इसे विरासत स्थल की तरह विकसित करने की बात भी सामने आई है। यदि जरूरी सुविधाएं विकसित की जाती हैं और पुरानी संरचना के साथ आसपास के प्राकृतिक वातावरण को सुरक्षित रखा जाता है, तो ऊमरडोली युवाओं के लिए एक बेहतर वीकेंड डेस्टिनेशन और कटनी के लिए एक अलग पर्यटन पहचान बन सकता है।
यशभारत की सलाह
मानसून में यहां घूमने जाएं तो रोमांच के साथ थोड़ी समझदारी भी जरूरी है। पहाड़ी रास्तों पर फिसलन हो सकती है, इसलिए वाहन सावधानी से चलाएं। ओवरफ्लो वाले हिस्सों, गहरे पानी और चट्टानों के किनारे जाने से बचें। जंगल क्षेत्र में वन्यजीव या विषैले जीव मिल सकते हैं, इसलिए सुरक्षित दूरी बनाए रखें।
फोटो और रील के चक्कर में पानी या ऊंची चट्टानों के करीब जोखिम न लें। प्रकृति का आनंद लें और अपना कचरा साथ वापस लेकर आएं, ताकि अगली बार आने वालों को भी ऊमरडोली उतना ही खूबसूरत मिले।
ऊमरडोली की सबसे खास बात यही है कि यहां घूमने के लिए सिर्फ एक वजह नहीं है। किसी को बारिश में छलकता पानी पसंद आएगा, किसी को जंगल और पहाड़, तो किसी को सौ साल पुरानी पत्थरों की इंजीनियरिंग। और जब ये तीनों एक साथ सामने हों, तो सफर सिर्फ घूमना नहीं रहता—एक याद बन जाता है।







