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जबलपुर की मिट्टी में है अरहर के उच्च उत्पादन की जबरदस्त क्षमता कम लागत में होती है अच्छी पैदावार

18 से लेकर 22 क्विंटल प्रति हेक्टेयर प्राप्त होती है उपज

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जबलपुर यशभारत।
दलहनी फसलें मानव एवं पशु पोषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। दालें प्रोटीन का सबसे सस्ता स्रोत हैं और इसलिए, मानव आहार संबंधी जरूरतों को संतुलित करने में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। जबलपुर की मिट्टी और कृषि-जलवायु स्थितियों में वर्षा आधारित और सिंचित खेती में अरहर के उच्च उत्पादन की जबरदस्त क्षमता है। इसके अलावा दालें वायुमंडलीय नाइट्रोजन को स्थिर करके मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाती हैं, गहरी जड़ो से मिट्टी की संरचना और पानी को अवशोषित करने की क्षमता को बडाती हैं।उक्त जानकारी उपसंचालक रवि आम्रवंशी ने देते हुए बताया कि अरहर की खेती किसानों के लिए कम लागत में अच्छी पैदावार देती है। उन्होंने आगे बताया कि अरहर की खेती के लिए मध्यम ऊंची, ढलान वाली भूमि अधिक उपयोगी है। दलहनी फसल होने के कारण यह मिट्टी को नाइट्रोजन प्रदान करती है। इसे कवर फसल के रूप में भी उगाया जाता है और मिट्टी के कटाव को कम किया जा सकता है। इसे सब्जी, दलहन, तिलहन आदि फसल के साथ अंतरफसल के रूप में उगाया जा सकता है। उन्होंने आगे बताया कि अरहर की उपज- 18 से 22 क्विंटल प्रति हेक्टेयर प्राप्त होती है।

मिट्टी को भुरभुरी कर लेना चाहिए
अरहर की खेती करने वाले किसानों को उन्होंने सलाह दी है कि मिट्टी- बलुई दोमट से गहरी दोमट अच्छे जल निकास वाली मिट्टी होनी चाहिएI भूमि की तैयारी- मानसून की शुरुआत के साथ मिट्टी की दो बार जुताई कर मिट्टी को भुरभुरी कर लेना चाहिए। भूमि की तैयारी के समय जल निकास की उचित व्यवस्था करना चाहिए।
अरहर की उन्नत किस्मे
उपसंचालक कृषि रवि आम्रवंशी बताया कि अरहर की उन्नत किस्में कम अवधि में तैयार हो जाती हैं जिसमें (120-130 दिन) पूसा अरहर-16 यूपीएएस-120, प्रभात, पूसा अगेती
लंबी अवधि (210-220 दिन) मालवीय अरहर-13, नरेन्द्र-1 आदि किस्में में शामिल हैं।
यह है अरहर की बुवाई का समय
बुआई का समय जून के तीसरे सप्ताह से जुलाई के तीसरे सप्ताह तक। बीज दर और अंतर- 12 से 15 किलोग्राम बीज/हे. की आवश्यकता होती है। कतार से कतार की दूरी 60 से 75 सेमी और पौधे से पौधे की दूरी 25 से 30 सेमी रखें। बीज को 4 से 5 सेमी की गहराई पर बोना चाहिए।
इस तरह करें बीज उपचार
बीज उपचार- बीज को कैप्टान या थीरम 2.5 से 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें। खाद एवं उर्वरक- गोबर की खाद 10 टन/हे., यूरिया 43 किग्रा, रॉकफॉस्फेट 250 किग्रा, म्यूरेट ऑफ पोटाश 50 किग्रा, जैवउर्वरक प्रति किलोग्राम बीज के साथ 25 ग्राम राइजोबियम और 25 ग्राम बायोफॉस। गोबर की खाद और रॉक फॉस्फेट को खेत की तैयारी के समय बुआई से 15 से 20 दिन पहले डालकर मिट्टी में अच्छी तरह मिला देना चाहिए। अन्य उर्वरक (नाइट्रोजन और पोटाश) को बेसल खुराक के रूप में बुआई के समय उपयोग करना चाहिए।
वर्षा आधारित परिस्थितियों में यह करें
अंतरफसल और फसल प्रणाली- कम अवधि वाली अरहर किस्मों की उपलब्धता के साथ वर्षा आधारित परिस्थितियों में निम्नलिखित फसल चक्र अपनाए जा सकते हैं। अरहर जबलपुर में अंतरफसल के लिए उपयुक्त है। अरहर के साथ-साथ अधिकांश अनाज, दलहन और तिलहन को अंतरफसल के रूप में उगाया जा सकता है।अरहर + मूंग/लोबिया, अरहर + तिल/मूँगफली
खरपतवार प्रबंधन- खेत को 45 से 50 दिन तक खरपतवार से मुक्त रखना चाहिए। पहली निराई-गुड़ाई बुआई के 25 से 30 दिन बाद करनी चाहिए। दूसरी निराई-गुड़ाई बुआई के 45 से 50 दिन बाद करनी चाहिए।
इस तरह करें किट का नियंत्रण
फली छेदक अरहर का एक महत्वपूर्ण कीट है जो आमतौर पर देखा जाता है। लार्वा कोमल पत्तियों और टहनियों को खाते हैं। फली बनने के समय ये फली मे छेद कर विकसित हो रहे दानों को खा लेते हैं। नियंत्रण उपाय- प्रति हेक्टेयर 1000 लीटर पानी में 750 मिलीलीटर मोनोक्रोटोफॉस 40 ईसी दवा मिलाकर छिड़काव करें।
अरहर की फसल में रोग नियंत्रण
विल्ट रोगी पौधों में बुआई के 5 से 6 सप्ताह बाद धीरे-धीरे पीलापन और मुरझाहट दिखाई देने लगती है। कॉलर क्षेत्र और ऊपरी जड़ों पर काले घाव देखाई देते हैं। नियंत्रण- फसल चक्र अपनाए। सहनशील रोग रोधी किस्में एन.पी.-15 एवं एन.पी.-38 लगाऐ।
ऐसी स्थिति में करें कटाई
कटाई एवं गहाई- फसल की कटाई तब करनी चाहिए जब दो-तिहाई से तीन-चौथाई फलियाँ भूरी हो जाएँ। कटे हुए पौधों को ढेर बनाकर धूप में सूखने के लिए कुछ दिनों के लिए छोड़ देना चाहिए। थ्रेसिंग फलियों को डंडे से पीटकर करनी चाहिए। प्राप्त उपज साफ स्वच्छ होनी चाहिए। इसके अलावा इसे थ्रेशर की सहायता से भी गहाई की जा सकती है।

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