भोपालमध्य प्रदेश

वाजपेयी नगर मल्टी का वो अंधा कत्ल जिसने भोपाल को दहलाया, पानी की टंकी में मासूम का शव और इंस्पेक्टर चौहान की तफ्तीश के वो सनसनीखेज 48 घंटे!

वाजपेयी नगर मल्टी का वो अंधा कत्ल जिसने भोपाल को दहलाया, पानी की टंकी में मासूम का शव और इंस्पेक्टर चौहान की तफ्तीश के वो सनसनीखेज 48 घंटे!

मिलिए इंस्पेक्टर उमेश पाल सिंह चौहान से

भोपाल, यशभारत। मध्य प्रदेश पुलिसिंग के इतिहास में कुछ अफसर ऐसे होते हैं जिनका नाम सुनते ही अपराधियों के हौसले पस्त हो जाते हैं। इंस्पेक्टर उमेश पाल सिंह चौहान उन्हीं जांबाज अफसरों में से एक हैं। साल 1984 में एक पुलिस कॉन्स्टेबल के रूप में महकमे में भर्ती हुए। अपनी बेदाग सर्विस और सिंह जैसी जांबाजी के दम पर वह 2021 में इंस्पेक्टर बने। चौहान साहब ने अपने करियर का एक बड़ा हिस्सा भिंड, दतिया और ग्वालियर जैसे जिलों में काटा। यह वो दौर था जब उन्होंने कई खूंखार डकैतों को मिट्टी में मिलाया और गैंगस्टर्स के नेटवर्क को ध्वस्त किया। डकैतों से लोहा लेने वाले इस अफसर ने अपने 42 साल के करियर में कभी नहीं सोचा था कि भोपाल के शाहजहांनाबाद में आया एक केस उनके जीवन की सबसे बड़ा यादगार केस बन जाएगा
वाजपेयी नगर आवासीय परिसर मल्टी यह कोई आम इलाका नहीं है। सैकड़ों बंद फ्लैट्स, हजारों की आबादी और भूलभुलैया जैसी संकरी गलियां। एक ऐसी जगह जहां दिनभर पैर रखने की जगह नहीं होती, वहां से 5 साल की एक मासूम बच्ची अचानक गायब हो जाती है। घनी आबादी के कारण हर चेहरा संदिग्ध था। पुलिस के लिए यह भूसे के ढेर में सुई ढूंढने जैसा था। लेकिन सबसे बड़ा सच यह था कि मासूम की हत्या हो चुकी थी और उसका शव एक बंद फ्लैट की पानी की टंकी में सड़ रहा था। दरिंदा रात के अंधेरे का इंतजार कर रहा था ताकि लाश को ठिकाने लगा सके।

तफ्तीश के वो सनसनीखेज 48 घंटे: इंस्पेक्टर चौहान की जुबानी

सवाल: चौहान साहब, जब इतनी घनी आबादी के बीच से बच्ची गायब हुई, तो आपने इस केस को शुरुआती घंटों में कैसे संभाला?

उमेश पाल सिंह चौहान: वह बहुच बड़ी चुनौती सिर्फ थी। वाजपेयी नगर मल्टी की बनावट ऐसी है कि कोई भी चकरा जाए। जब उस मासूम की मां रोती-बिलखती, छाती पीटती हुई थाने आई, तो मेरी वर्दी के भीतर का इंसान और एक पिता जाग गया। मैंने अपनी टीम की आंखों में देखा और कहा हमारे पास रोने या वक्त गंवाने की मोहलत नहीं है, समय ही हमारा सबसे बड़ा दुश्मन है। हमने बिना एक पल गंवाए अपहरण का केस दर्ज किया और ऑपरेशन शुरू कर दिया।

सवाल: 100 से ज्यादा पुलिस जवान, डॉग स्क्वायड, सीसीटीवी… उस रात वाजपेयी नगर मल्टी में क्या माहौल था?

उमेश पाल सिंह चौहान: दबाव का पहाड़ हमारे ऊपर था। सीधे मुख्यमंत्री जी और हमारे आला अधिकारी पल-पल की रिपोर्ट ले रहे थे। हमने 5 थानों के 100 से अधिक जांबाज जवानों को बुलाया और पूरी मल्टी को चारों तरफ से घेर लिया।
हम सिर्फ तलाशी नहीं ले रहे थे, हम वहां रहने वाले हर शख्स की आंखें पढ़ रहे थे। खोजी कुत्ते और सीसीटीवी कैमरों की मदद से तफ्तीश की हर कड़ी को जोड़ा जा रहा था।

द टर्निंग पॉइंट

लापता होने का तीसरा दिन था। हमारी टीम एक संदेहास्पद बंद फ्लैट के सामने खड़ी थी। हमें कुछ अजीब लगा। जैसे ही ताला तोड़कर हम अंदर घुसे, वहां सन्नाटा पसरा था। लेकिन जैसे ही हमारी नजर कोने में रखी पानी की टंकी पर गई और हमने उसका ढक्कन खोला… अंदर का मंजर रूह कंपा देने वाला था। कातिल अतुल ने मासूम की हत्या कर लाश को उसी टंकी में ठूंस दिया था। उस पल मेरी आंखें भर आई थीं, लेकिन कानून के रक्षक को रोने की इजाजत नहीं होती, हमें कातिल को दबोचना था।

सवाल: लाश को टंकी में छिपाने के पीछे आरोपी का अगला खौफनाक प्लान क्या था? वो भोपाल स्टेशन पर कैसे फंसा?

उमेश पाल सिंह चौहान: आरोपी अतुल निहाले कोई नौसिखिया नहीं, शातिर अपराधी था। वो खरगोन में भी महिला उत्पीड़न के केस में जेल काट चुका था। उसने कुबूल किया कि वो लाश को रात के अंधेरे में मल्टी से बाहर फेंकना चाहता था। लेकिन शाहजहांनाबाद पुलिस की 24 घंटे की सख्त घेराबंदी ने उसका दम घोंट दिया था।
जब उसे लगा कि वो लाश बाहर नहीं निकाल पाएगा, तो वो फ्लैट लॉक करके भाग खड़ा हुआ। हमारी टीम और क्राइम ब्रांच ने जाल बिछाया। भोपाल रेलवे स्टेशन पर, जब वो ट्रेन पकड़कर राज्य से बाहर भागने की फिराक में था, हमने उसे दबोच लिया।

सवाल: इस केस का सबसे हैरान करने वाला पहलू आरोपी की मां और बहन की गिरफ्तारी रही। उनकी क्या भूमिका थी?

उमेश पाल सिंह चौहान: यह इस पूरे घटनाक्रम का सबसे शर्मनाक हिस्सा है। जब अतुल इस जघन्य अपराध को अंजाम दे रहा था, उसकी मां और बहन सब जानती थीं। उन्होंने टंकी में छिपे शव को देखा था, लेकिन ममता और इंसानियत को ताक पर रखकर उन्होंने पुलिस को गुमराह किया। वे आरोपी को भोपाल से भगाने की साजिश में शामिल थीं। कानून की नजर में पापी की मदद करना भी उतना ही बड़ा पाप है, इसलिए हमने उन्हें भी सह-आरोपी बनाकर जेल की सलाखों के पीछे भेजा।

सवाल: शाहजहांनाबाद का यह केस आपके 42 साल के करियर में क्या जगह रखता है?

उमेश पाल सिंह चौहान: खाकी के धैर्य की ऐसी परीक्षा मैंने पहले कभी नहीं दी। उस मासूम बच्ची को जिंदा न बचा पाने का मलाल मुझे और मेरे महकमे को जिंदगी भर रहेगा… लेकिन संतोष इस बात का है कि मेरी टीम ने महज 48 घंटे में इस अंधे कत्ल के चेहरे से नकाब हटा दिया। हमारी मुस्तैद वैज्ञानिक तफ्तीश और मजबूत चार्जशीट का ही नतीजा है कि अदालत ने दरिंदे अतुल को फांसी की सजा सुनाई। यह इंसाफ उस मासूम बच्ची की आत्मा के लिए है।

सवाल: आज जो युवा खाकी पहनने का सपना देख रहे हैं, उनके लिए आपका क्या संदेश है?

उमेश पाल सिंह चौहान: मैं उन सभी युवाओं से साफ कहना चाहता हूं अगर सिर्फ रौब झाड़ने या ऐश-ओ-आराम की नौकरी के लिए खाकी चुन रहे हो, तो मत आना! आज का अपराधी हाईटेक है, क्राइम के तरीके बदल चुके हैं।

आज की पुलिसिंग में सिर्फ शारीरिक ताकत नहीं, बल्कि मानसिक मजबूती, तकनीक की समझ और सबसे बढ़कर धैर्य की जरूरत है। जब आप वर्दी पहनकर फील्ड में उतरते हैं, तो आपके पास फेल होने का कोई मौका नहीं होता।

याद रखना, जब एक बेकसूर को आपकी वजह से इंसाफ मिलता है और अपराधी को फांसी के फंदे तक पहुंचाया जाता है, तो वो जो सुकून है ना… उसकी कीमत दुनिया की कोई दौलत नहीं चुका सकती। वर्दी सिर्फ एक कपड़ा नहीं, करोड़ों लोगों का भरोसा है। इसके लिए खुद को दिमागी तौर पर फौलाद बनाओ!

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button