प्रदेश का सबसे बड़े सरकारी अस्पताल के हाल बेहाल

प्रदेश का सबसे बड़े सरकारी अस्पताल के हाल बेहाल
– हमीदिया अस्पताल में पसरी गंदगी, जमीन पर बैठने को मजबूर लोग
संकेत नाईक, भोपाल। राजधानी भोपाल का हमीदिया अस्पताल में अव्यवस्थाओं का आलम है। हमीदिया अस्पताल को प्रदेश के सबसे बड़े और प्रमुख सरकारी अस्पतालों में गिना जाता है बावजूद इसके यह अस्पताल अपनी बदहाल व्यवस्था की वजह से सुर्खियों में है। करोड़ों रुपए के बजट, आधुनिक विभागों और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के सरकारी दावों के बीच अस्पताल के हालात इस कदर खराब हैं कि यहां आने वाला हर मरीज और उसका परिजन खुद को ठगा हुआ महसूस करता है। अस्पताल के नाम पर खड़ा विशाल भवन बाहर से जितना भव्य दिखता है, भीतर की व्यवस्था उतनी ही चरमराई हुई है।
अस्पताल परिसर में प्रवेश करते ही बदइंतजामी का दृश्य साफ नजर आता है। कई जगहों पर कचरे के ढेर, टूटी बेंचें और गंदगी फैली हुई है। साफ-सफाई ऐसी कि किसी भी समय संक्रमण फैलने का खतरा महसूस होता है। मरीजों और परिजनों का कहना है कि अस्पताल में सफाई कर्मचारियों की मौजूदगी कम ही दिखती है, और शिकायतों पर भी कोई असर नहीं होता।
सबसे गंभीर समस्या है मरीजों के परिजनों के लिए बैठने या ठहरने की जगह का अभाव। अस्पताल में रोजाना हजारों लोग इलाज के लिए आते हैं, लेकिन उनके साथ आए परिजनों के लिए न तो उचित सीटिंग व्यवस्था है, न ही कोई आसरा। ठंड के दिनों में हालात और भी बदतर हो जाते हैं। कई परिजन अस्पताल की गलियारों या खुले परिसर में ठंडे फर्श पर रात बिताने को मजबूर हैं। कई महिलाओं ने बताया कि रात में सुरक्षा भी बड़ी चिंता का विषय होती है, लेकिन मजबूरी में वहीं रुकना पड़ता है।
ओपीडी और इमरजेंसी में भी अव्यवस्था का यही हाल है। भीड़ इतनी कि मरीज लाइन में खड़े-खड़े ही थक जाते हैं। कई को स्ट्रेचर नहीं मिलता, तो परिजन खुद ही उन्हें उठाकर ले जाते हैं। दवाइयों की कमी और जांच में देरी की शिकायतें लगातार सामने आती रहती हैं। कई मरीज कहते हैं कि “मुफ्त इलाज” के नाम पर उन्हें बाहर की महंगी लैब में जांच कराने भेज दिया जाता है।
अस्पताल की स्थिति पर सवाल उठाने पर अधिकारी औपचारिक जवाब देकर पल्ला झाड़ लेते हैं। पिछले वर्षों में हमीदिया अस्पताल को सुपर स्पेशिलिटी’ बनाने के बड़े-बड़े दावे सरकारी मंचों से किए गए, लेकिन जमीनी स्तर पर व्यवस्थाएं उसी पुराने ढर्रे पर अटकी हुई हैं। नई इमारतें और आधुनिक मशीनें होने के बावजूद मरीजों को राहत नहीं मिल रही। असल आवश्यकता है—व्यवस्था सुधारने की, न कि सिर्फ ढांचा खड़ा करने की।
परिजनों का कहना है यहां इलाज से ज्यादा परेशानियां मिलती हैं। डॉक्टर कम, मरीज ज्यादा। हर जगह भीड़। बैठने की जगह भी न मिले तो मरीज की देखभाल कैसे करें कई लोग यह भी बताते हैं कि अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था इतनी कमजोर है कि रात के समय असामाजिक तत्व घूमते दिखाई देते हैं, जिससे महिलाएं और बुजुर्ग परिजन भय के माहौल में रात कटाते हैं। हमीदिया अस्पताल की बदहाली यह सवाल खड़ा करती है कि आखिर प्रदेश की राजधानी में स्थित सबसे बड़े सरकारी मेडिकल संस्थान के हालात इतने लचर क्यों हैं? जब राजधानी का यह हाल है, तो दूर-दराज के जिलों की स्थिति का अंदाजा खुद लगाया जा सकता है।
सरकार और प्रशासन को चाहिए कि वे सिर्फ कागज़ों पर सुधार दिखाने के बजाय वास्तविक समस्याओं को दूर करने के लिए ठोस कदम उठाएं। सफाई, सुरक्षा, बैठने की व्यवस्था और मरीजों को मिलने वाली बुनियादी सुविधाओं को प्राथमिकता में रखा जाए।







