अब खुद खबर बन गए डाकबाबू: डिजिटल युग में गायब हुई चिट्टियां. लेटर बॉक्स हुए जर्जर
पोस्टमैन को देखते ही भीड़ हो जाती थी एकत्रित

किशोर गौतम
जबलपुर यशभारत। पोस्ट कार्ड या अंतर्देशी पत्र किसी के घर पहुंचना अब बीते जमाने की बात हो चुकी है। बदलते वक्त ने चिट्ठी पत्री की उपयोगिता समाप्त कर दी। अब पलभर में मोबाइल पर सीधे बात हो रही है और मैसेज के जरिए अपनी भावनाएं व्यक्त की जाने लगी हैं। अब डाकघरों के रेड लैटर बॉक्स शो पीस बनकर रह गए हैं। अब इनकी सुध कोई नहीं लेता।एक जमाना था जब पत्रों को खुशी से पढ़ा जाता था और लोग मोहल्ले वालों को भी बताते थे कि आज हमारे फलां रिश्तेदार के यहां से पत्र आया है। ऐसा ही नहीं उस पत्र को लोग बड़े इंतजाम से रखते थे और बाद में उसका जवाब भी दिया जाता था। पत्रों का मजमून भी दिलचस्प होता था। बड़ों को चरण स्पर्श छोटों को प्यार यहां सब कुशलता है आशा है कि आप भी कुशल पूर्वक होगें से शुरू होकर अंत में पत्र में यह भी लिखा होता था कि आगे क्या लिखूं आप तो खुद समझदार है। इस तरह से उस दौर में पत्रों को लिखा जाता था। उस समय पर लिखे गए पत्रों में एक अलग ही भाव झलकता था। वहीं इन भाव भरे शब्दों में मशहूर गजल गायक पंकज उदास कि वह गजल आज भी गजल प्रेमियों के दिलों दिमाग में है जिसमें उन्होंने बड़े ही लयबद्ध तरीके से यह पंक्तियां गाई थी कि पहले जब तू खत लिखना था तो कागज में चेहरा दिखता था …।

और अब वह खुद खबर बन गए
इन पत्रों में अपनी बात दूसरे शहर और परिजनों तक पहुंचाने के लिए उस दौर में एक मात्र साधन चिट्ठियां हुआ करती थी। जिसमें जिंदगी से जुड़ी हर छोटी-बड़ी बात को कागज में लिखकर उसे लिफाफे में बंद करके लेटर बॉक्स में डाल देते थे। लेकिन समय बदलते ही सबको खबर देने वाले लेटर बॉक्स भी अब बेखबर हो गए और खुद खबर बन गए …!
दो तरह के होते थे लेटर बॉक्स
अपनी बात को अपनों तक पत्र के माध्यम से पहुंचाने के लिए दो तरह के लेटर बॉक्स हर चौराहे एवं मोहल्ले में हुआ करते थे। यह लेटर बॉक्स दो कलर के होते थे जिसमें लाल कलर के लेटर बॉक्स से दूर दराज के पत्र डाले जाते थे वही स्थानीय पत्रों को हरे लेटर बॉक्स डाला जाता था। ग्रामीण अंचलों से लेकर शहर के कई स्थानों पर लगे रखे लेटर बॉक्स अब अपनी पहचान खो चुके हैं।
अब चल रहा डिजिटल का दौर
अब इसकी जगह इंटरनेट ने ले ली है।आज डिजिटल युग के दौर में मोबाइल, इंस्टाग्राम फेसबुक और इंटरनेट मीडिया के माध्यम से वीडियो कॉलिंग के माध्यम से एक दूसरे को देखकर सीधे बातचीत हो जाती है। इस डिजिटल युग में अब डाक विभाग के लेटर बाक्स का कोई मायने नहीं रह गया है। हालांकि अभी भी कहीं कहीं देखने को मिल जाते हैं।लेकिन चिट्ठियां नजर नहीं आती है।
पोस्टमैन को देखकर लग जाती थी भीड़
इस डिजिटल युग के पहले शहर एवं ग्रामीण अंचलों में पोस्टमैन को अपने घर की ओर आते देख उसकी एक ही आवाज पर लोगों की भीड़ एकत्रित हो जाती थी। और भीड़ में से यह भी आवाज आती थी की हमारी भी चिट्ठी आई है क्या …। और जब पोस्टमैन अपने खादी के झोला चिट्ठी निकाल कर देखा था तो वह खुशी से झूम उठते थे और जिसके नाम से कोई चिट्ठी नहीं आती तो वह मायूस सा हो जाता था।
चिट्ठियों पर लिखे और गाए गए गाने
1-लिखे जो खत तुझे,वो तेरी याद में,हज़ारों रंग के ,नजारे बन गए।
2-हमने सनम को खत लिखा, खत में लिखा,ऐदिलरुबा दिल की गली,शहेरे वफ़ा ।
3-खत लिखदे सावरिया के नाम बाबू ,वो जान जाएंगे,पहचान जाएँगे ।।
4-फूल तुम्हे भेजा है खत में ,फूल नही मेरा दिल है ,पिर्येतम मेरे,मुझको लिखना ,क्या ये तुम्हारे काबिल है ।
5-हाय -हाय एक लड़का ,मुझको खत लिखता है ।
6-आपका खत मिला, आपका शुक्रिया ,आपने याद मुझको किया,आपका शुक्रिया,शुक्रिया ।
7- जाते हो परदेश पिया जाते ही खत लिखना…।
8-मेरा खत पढ़के ,हैरत है सबको ,प्यार में हमने क्या लिख दिया है ।
9-चिट्ठी आई है आई है चिट्ठी आई है।
10- चिट्ठी ना कोई संदेश…।
11-कबूतर जा… जा …जा …पहले प्यार की पहली चिट्ठी साजन को दे आ …आदि ऐसे अनेक गाने जिसमें चिट्ठियों का उल्लेख करते हुए बहुत ही सुन्दर और संजो कर लयबद्ध किया गया है।







