धरोहर से खिलवाड़, शहीद के हक से इंकार : 200 साल के ऐतिहासिक स्कूल का नाम बदलने पर विवाद, सरकार ने बदला नाम

24 साल से शहीद परिवार को नहीं मिला हक
सागर, यशभारत ।सागर के 200वें स्थापना वर्ष में प्रवेश कर रहे ऐतिहासिक शासकीय बहुउद्देश्यीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय (एक्सीलेंस स्कूल) का नाम बदले जाने को लेकर विवाद गहरा गया है। एक तरफ जहाँ शहरवासी और पूर्व छात्र बिना किसी जनमत के 200 साल पुरानी ऐतिहासिक धरोहर की पहचान बदलने पर आक्रोशित हैं, वहीं दूसरी तरफ जिस शहीद जवान के नाम पर स्कूल का साइन बोर्ड बदला गया है, उसका परिवार पिछले 24 सालों से अपने वाजिब हक के लिए दर-दर भटकने को मजबूर है।
मामला 11 अगस्त 2002 का है, जब उड़ीसा में नक्सली मुठभेड़ के दौरान सागर (लाजपतपुरा वार्ड) के 22 वर्षीय जवान प्रदीप लारिया देश के लिए शहीद हो गए थे। शहादत के दो दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी मध्य प्रदेश सरकार के गृह विभाग ने उन्हें विधिवत शहीद का दर्जा ही नहीं दिया है।
शहीद के दिव्यांग भाई डॉ. प्रमोद लारिया के अनुसार, सरकार ने न तो परिवार को कॉरप्स फंड से 10 लाख रुपये की अनुग्रह राशि दी और न ही अनुकंपा नियुक्ति का लाभ दिया। गृह विभाग का तर्क है कि शहादत ‘काउंटर इंसर्जेंसी एरिया’ में नहीं हुई, जबकि डॉ. लारिया द्वारा आरटीआई से निकाली गई उड़ीसा इंटेलिजेंस ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार वह क्षेत्र 1996 से ही नक्सल प्रभावित दर्ज है। इसके अलावा, वर्ष 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा विमोचित पुस्तकों ‘वारियर्स रिमेम्बर्ड’ और ‘नमन’ में भी शहीद प्रदीप की शहादत का स्पष्ट उल्लेख है।
माँ पान बाई के निधन के बाद अब दिव्यांग भाई अपने हक की लड़ाई लड़ने के लिए हाईकोर्ट जबलपुर का दरवाजा खटखटाने को मजबूर हैं।
पूर्व छात्रों और शहरवासियों का कहना है कि यदि सरकार को शहीद का सम्मान ही करना था, तो पहले उनके परिवार को वाजिब हक, अनुग्रह राशि और अनुकंपा नियुक्ति दी जानी चाहिए थी। किसी ऐतिहासिक धरोहर की मूल पहचान को मिटाकर राजनीतिक वाहवाही लूटना न्यायसंगत नहीं है।
शहरवासियों में भारी आक्रोश
दूसरी ओर, विद्यालय के 200वें स्थापना वर्ष की तैयारी कर रहे पूर्व छात्रों और स्थानीय समाजसेवियों में अचानक नाम बदले जाने को लेकर गहरा असंतोष है। पूर्व छात्र सुधांशु तिवारी का कहना है कि दुनिया भर में पहचान रखने वाले इस ऐतिहासिक संस्थान की मौलिक पहचान को बिना किसी संवाद या जनप्रतिनिधियों को विश्वास में लिए समाप्त कर दिया गया।







