1895 में स्थापित हुआ दिव्य दरबार : सूनी गोद भरती हैं बड़ी माता : सच्चे मन से मांगी मन्नत होती है पूरी

मंडला। जिले के महाराजपुर स्थित पवित्र संगम घाट क्षेत्र में विराजमान बड़ी माता का स्थान श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। बूढ़ी माई माता के मंदिर के समीप पिण्डी रूप में स्थापित बड़ी माता को मरहाई माता के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि माता के दरबार में सच्चे मन से मांगी गई मन्नत पूरी होती है। विशेष रूप से संतान सुख की कामना करने वाले श्रद्धालु यहां पहुंचकर माता के समक्ष अपनी अर्जी लगाते हैं। नवरात्र के दिनों में मंदिर परिसर में भक्तों की आस्था और धार्मिक गतिविधियां विशेष रूप से देखने को मिलती हैं।
बूढ़ी माई के आसपास विराजमान हैं कई स्वरूप
माता के सेवक के अनुसार, बूढ़ी माई माता के आसपास सुनबहरी माता, बड़ी माता, बाहरवासिनी माता, खैरमाई और शीतला माता सहित विभिन्न देवी स्वरूप विराजमान हैं। इनमें बड़ी माता का स्थान अपनी विशिष्ट मान्यताओं के लिए जाना जाता है। बड़ी माता को बूढ़ी माई के मुख्य स्थान से अलग स्थापित किया गया है। स्थानीय श्रद्धालु इन्हें ग्राम माता के रूप में पूजते हैं और सुख-समृद्धि, परिवार की खुशहाली तथा मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए माता के दर्शन करने पहुंचते हैं।
वर्ष 1895 में स्थापना की मान्यता
स्थानीय मान्यता के अनुसार, बड़ी माता की पिण्डी को वर्ष 1895 में ददनू नामक पंडा रामनगर खरेहनी से लाकर महाराजपुर में स्थापित किया था। तब से यहां माता की पूजा-अर्चना की परंपरा चली आ रही है। समय के साथ यह स्थान क्षेत्रीय श्रद्धालुओं की धार्मिक आस्था से जुड़ता गया। भक्त माता को अपनी ग्राम रक्षक देवी मानकर पूजा करते हैं तथा परिवार पर आने वाले संकटों से रक्षा और सुख-शांति की कामना करते हैं।
संतान सुख की कामना लेकर पहुंचते हैं श्रद्धालु
बड़ी माता के दरबार से जुड़ी सबसे प्रमुख मान्यताओं में संतान सुख की कामना शामिल है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि माता की आराधना और मन्नत से सूनी गोद भरने का आशीर्वाद मिलता है। इसी कारण संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले दंपती यहां पहुंचकर माता के समक्ष प्रार्थना करते हैं। इसके अलावा चोरी तथा कोट-कचहरी से जुड़े मामलों में राहत और न्याय की कामना लेकर भी लोग माता के दरबार में मन्नत मांगते हैं। भक्तों की मान्यता है कि मन्नत के साथ श्रद्धा और विश्वास का विशेष महत्व है।
चैत्र नवरात्र में बलि, शारदेय नवरात्र में मीठे भोग की परंपरा
बड़ी माता के पूजन में नवरात्र का विशेष महत्व है। स्थानीय परंपरा के अनुसार, चैत्र नवरात्र के दौरान यहां बलि का विधान है, जबकि शारदेय नवरात्र में माता को मीठी अठवाई और हलुए का भोग अर्पित किया जाता है। नौ दिनों तक चलने वाले शारदेय नवरात्र में मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना होती है। इस दौरान यहां नारियल नहीं फोड़ने की परंपरा भी बताई जाती है। श्रद्धालु अपनी-अपनी मान्यताओं के अनुसार माता की सेवा, पूजन और भोग अर्पित करते हैं।
मन्नत पूरी होने पर दोनों पहर दर्शन करने पहुंचते हैं भक्त
शारदेय नवरात्र के अवसर पर बड़ी माता के दरबार में श्रद्धालुओं की आस्था देखते ही बनती है। अपनी मनोकामना के अनुरूप भक्तों ने यहां जवारे और खप्पर स्थापित कराए हैं। जिन श्रद्धालुओं की मन्नत पूरी होने की मान्यता है, वे माता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए सुबह और शाम दोनों पहर दर्शन करने पहुंचते हैं। मंदिर परिसर में पूजा-अर्चना और दर्शन का सिलसिला जारी रहता है। महाराजपुर संगम घाट स्थित बड़ी माता का यह स्थान केवल पूजा-अर्चना का केंद्र ही नहीं, बल्कि स्थानीय धार्मिक परंपराओं और पीढ़ियों से चली आ रही आस्था का प्रतीक भी है। नवरात्र के अवसर पर यहां पहुंचने वाले श्रद्धालु माता से परिवार की खुशहाली, संतान सुख और जीवन की कठिनाइयों से मुक्ति की कामना करते हैं।







