मुख्य ख़बरें

बहनों ने दिया इकलौते भाई की अर्थी को कांधा : बड़ी बहन ने दी मुखाग्नि… देखें पूरा वीडियो

कान्हीवाड़ा में कवि पं. रविशंकर शुक्ला ‘रवि विद्रोही’ के अंतिम संस्कार का मार्मिक दृश्य, परंपराओं से आगे बढ़कर बहनों ने निभाया भाई का फर्जल

सिवनी यश भारत:-सिवनी जिले के कान्हीवाड़ा में पंडित रविशंकर शुक्ला उर्फ रवि विद्रोही के निधन के बाद उनके अंतिम संस्कार का दृश्य हर किसी की आंखें नम कर गया। अविवाहित रवि विद्रोही के परिवार में कोई अन्य पुरुष सदस्य नहीं होने के कारण उनकी बहनों ने ही अपने भाई के अंतिम संस्कार की पूरी जिम्मेदारी निभाई। बहनों ने भाई की अर्थी को कांधा दिया और बड़ी बहन रूखमणी शुक्ला ने चिता को मुखाग्नि देकर अंतिम विदाई दी। इस भावुक दृश्य ने उपस्थित लोगों को गहरे तक प्रभावित किया।

कान्हीवाड़ा के मोक्षधाम में जब रवि विद्रोही की अंतिम यात्रा पहुंची, तो उनकी बहनों ने पूरे साहस के साथ अंतिम संस्कार की रस्में निभाईं।

जिस भाई के साथ जीवनभर सुख-दुख के पल साझा किए, उसे अंतिम विदाई देते समय बहनों का दर्द साफ झलक रहा था। भाई की अर्थी को कांधा देने से लेकर मुखाग्नि देने तक उन्होंने अपने दायित्व का निर्वहन किया। इस दौरान वहां मौजूद परिजन, परिचित और अन्य लोग भावुक हो उठे।

रवि विद्रोही के निधन से उनके परिवार और परिचितों में शोक का माहौल है। साहित्य और कविता से जुड़े लोगों के लिए भी उनका जाना दुखद क्षण है। हालांकि, उनके साहित्यिक जीवन, प्रमुख रचनाओं और उपलब्धियों से संबंधित विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं होने के कारण उनके योगदान का आकलन करना संभव नहीं है।

भावनाओं के आगे छोटी पड़ गईं सामाजिक रूढ़ियां

भारतीय समाज में लंबे समय से अंतिम संस्कार की प्रमुख रस्में पुरुष परिजनों द्वारा निभाने की परंपरा रही है। हालांकि, समय के साथ बेटियों और बहनों द्वारा भी अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी निभाने के अनेक उदाहरण सामने आए हैं। हिंदू अंतिम संस्कार की विभिन्न परंपराओं में मुखाग्नि को विशेष महत्व दिया जाता है, लेकिन इसे निभाने के लिए केवल पुरुष होना अनिवार्य नहीं है। परिवार की परिस्थितियों और मान्यताओं के अनुसार महिलाएं भी यह दायित्व निभाती हैं।

कान्हीवाड़ा में बहनों द्वारा अपने इकलौते भाई को अंतिम विदाई देने का यह प्रसंग रिश्तों की गहराई, पारिवारिक जिम्मेदारी और सामाजिक बदलाव का भावुक उदाहरण बन गया। बहनों ने अपने कर्म से संदेश दिया कि अपनों के प्रति प्रेम और कर्तव्य किसी एक परंपरा या लिंग की सीमा में बंधे नहीं होते।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button