कैसी कही – फितरती – 50 दिन में फिर तबादला, अफसर ने पूछा आखिर कसूर क्या था

कैसी कही – फितरती –
50 दिन में फिर तबादला, अफसर ने पूछा आखिर कसूर क्या था
प्रदेश की तबादला संस्कृति एक बार फिर चर्चा में है। हाल ही में जारी सूची में एक वरिष्ठ महिला आईएएस अधिकारी का नाम आने के बाद उन्होंने अफसरों के समूह में अपनी नाराजगी और पीड़ा साझा की। उनका कहना है कि एक साल में यह उनका चौथा तबादला है और पिछली जिम्मेदारी संभाले महज 50 दिन ही हुए थे। अधिकारी ने कर्मचारियों पर अनुशासनहीनता, फाइलें रोकने और दुर्व्यवहार जैसे आरोप लगाए। उनका दावा है कि शिकायतों के बावजूद समस्या का समाधान नहीं हुआ और अंतत: उनका ही तबादला कर दिया गया। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार जहां जिम्मेदारी देती रही, वहां पूरी निष्ठा से काम किया। इसके बावजूद लगातार तबादलों ने उन्हें हतोत्साहित किया है। उन्होंने आईएएस एसोसिएशन से हस्तक्षेप की उम्मीद जताई। अब प्रशासनिक गलियारों में सवाल यही है शिकायतों की जांच जरूरी है या तबादला ही सबसे तेज समाधान है?
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सोशल मीडिया पोस्ट ने छेड़ी जाति और धर्म की बहस
सोशल मीडिया पर बयानबाजी का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। चुनावी उम्मीदवारों को अलग-अलग धार्मिक ग्रंथों और बच्चों की शपथ दिलाने वाले विवादित बयान के बाद एक पूर्व नौकरशाह ने अब मंदिर-मस्जिद, अंधविश्वास और जातीय राजनीति को लेकर फिर टिप्पणी की है। अपने पोस्ट में उन्होंने सवाल उठाया कि दुनिया अंतरिक्ष की खोज में आगे बढ़ रही है, जबकि यहां धार्मिक स्थलों के नीचे इतिहास तलाशने की होड़ लगी है। इसके साथ उन्होंने जातीय राजनीति और वोट बैंक को लेकर भी तीखी टिप्पणी की। पोस्ट में ओबीसी, एससी और एसटी वर्ग की राजनीतिक ताकत बढऩे की बात कहते हुए भविष्य की सत्ता के समीकरणों पर भी टिप्पणी की गई। स्वाभाविक है कि सोशल मीडिया पर बयान आते ही प्रतिक्रियाओं की बाढ़ भी आ गई।
मुद्दा गंभीर हो या विवादित, सोशल मीडिया का फार्मूला अब साफ है—पहले पोस्ट करो, फिर बहस को खुद दौडऩे दो।
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तबादला आने से पहले ही बदल गई कुर्सियों की पटकथा
महिला एवं बाल विकास विभाग में इन दिनों पोषण आहार से ज्यादा चर्चा कामकाज के बंटवारे की है। लंबे समय से महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल रहे एक संयुक्त संचालक की वर्क प्रोफाइल बदलने के साथ कई अधिकारियों के काम भी इधर से उधर कर दिए गए। खास बात यह रही कि विभागीय मुखिया के तबादले से पहले ही आदेश जारी हो गए। विभागीय अधिकारी इसे कई दिनों से चल रही प्रक्रिया बता रहे हैं और बैक डेट की बात से इनकार कर रहे हैं। उनका तर्क है कि जिन अधिकारियों का काम अपेक्षित नहीं था, उनकी जिम्मेदारियां बदली गईं। दूसरी ओर अधिकारी संघ ने इस प्रक्रिया की टाइमिंग पर सवाल उठाते हुए इसे नैतिकता के विरुद्ध बताया है। एक अधिकारी को स्थापना की जिम्मेदारी दी गई और उनके अधीन तीन उप संचालक कर दिए गए। अब विभाग में चर्चा है कि यह प्रशासनिक व्यवस्था है या कुर्सियों का ऐसा खेल, जिसमें फाइल से पहले ही भविष्य की पटकथा लिख दी जाती है।
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सीनियर पद खाली बताए, आईएएस की मांग उठी
लोक शिक्षण संचालनालय में वरिष्ठ अधिकारियों की कमी से काम प्रभावित होने का हवाला देते हुए शासन से अतिरिक्त अफसरों की मांग की गई है। संचालनालय ने एक आईएएस और दो राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों की पदस्थापना का प्रस्ताव भेजा है। दलील सीधी है सीनियर पद खाली हैं, इसलिए फैसले और कामकाज प्रभावित हो रहे हैं। लेकिन सरकारी दफ्तरों में हर प्रस्ताव का स्वागत हो, ऐसा जरूरी भी नहीं। प्रस्ताव भेजे जाने के बाद संचालनालय के कुछ अधिकारियों ने इसका विरोध शुरू कर दिया है। अब स्थिति कुछ ऐसी बन गई है कि विभाग को अफसरों की कमी भी खल रही है और नए अफसरों की संभावित आमद भी। यानी परेशानी कुर्सी खाली होने से है या कुर्सी भरने से, यह फिलहाल फाइलों के बीच उलझा हुआ सवाल है।
शासन के सामने अब चुनौती सिर्फ पद भरने की नहीं, बल्कि यह तय करने की भी है कि आखिर विभाग को चाहिए कितने अफसर और कितनी सहमति।
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