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यशभारत संपादकीय…मोहन भागवत का बयान भाजपा की आइडियोलॉजी का नया फलसफा..?

– आशीष सोनी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत के अमेरिका दौरे ने भारत के भीतर नई बहस को जन्म दे दिया है। न्यूयॉर्क स्थित मेडिसिन स्क्वायर गार्डन में यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि धर्म सभी को आपस में जोड़ता है और यह किसी एक मजहब या पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं है। उन्होंने कहा जो हिंदू यह मानता है कि मुसलमानों को भारत से बाहर कर देना चाहिए, वह सच्चा हिंदू नहीं हो सकता। देश के बाहर कही गई संघ प्रमुख की इस बात ने क्या भारतीय जनता पार्टी के सामने नया आंतरिक संकट खड़ा कर दिया है। चुनावी राजनीति में हिंदुत्व का कार्ड खेलने वाली भाजपा क्या भागवत के बयान से खुदको असहज पा रही है। कहीं उसकी आइडियोलॉजी तो प्रभावित नहीं हो रही। यह बयान ऐसे समय आया जब वैश्विक ध्रुवीकरण के बीच मुस्लिम कंट्री पूरी दुनियां में एक होने की कोशिश में है। अमेरिका में मुस्लिमों से सहानुभूति रखने वाले बयान को क्या इन्हीं कोशिशों से जोड़कर देखा जाना चाहिए। एक अरसे में हुई घटनाएं वैश्विक स्तर पर भारत की अस्थिरता को जाहिर करती हैं। बड़ा सवाल यही है कि इस ध्रुवीकरण में भारत कहां खड़ा है। राहुल गांधी संविधान की किताब हाथ में लेकर जो बातें कर रहे हैं, क्या उस मुद्दे को बैकडोर से हाइजेक करने के प्रयास शुरू हो चुके है, या पार्टी संघ के सहारे धर्मनिरपेक्षता और सर्वधर्म समभाव की नई छवि गढ़ने निकल पड़ी है। भाजपा और संघ को यह याद ही होगा कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 103 छोटे देशों का समूह बनाकर वैश्विक स्तर पर निर्गुट ताकत तैयार कर ली थी। मौजूदा स्थिति में भारत की विदेश नीति में ऐसा कोई चमत्कार नजर नहीं आ रहा, क्या इसीलिए संघ प्रमुख को अपना नया दृष्टिकोण सामने लाना पड़ा। गौरतलब है कि मोहन भागवत के इस दौरे और कार्यक्रम का अमेरिका में कई मानवाधिकार संगठनों, नागरिक समूहों और अमेरिकी डेमोक्रेटिक पार्टी के कुछ नेताओं द्वारा विरोध किया गया। अमरीकी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग ने भी इस यात्रा को लेकर आपत्तियां दर्ज कराईं। रिपोर्ट्स के अनुसार, लगभग 100 अमेरिकी निर्वाचित जनप्रतिनिधियों और उम्मीदवारों ने आरएसएस से जुड़े संगठनों के राजनीतिक चंदे को स्वीकार न करने का संकल्प लिया। उल्लेखनीय है कि भारतीय राजनीति में हिंदू-मुस्लिम मुद्दा लंबे समय से चुनावी विमर्श का सबसे आसान हथियार बना हुआ है। अगर भागवत के अमेरिका वाले संदेश को वास्तव में संघ की भविष्य की राजनीतिक- सामाजिक दिशा का संकेत माना जाए, तो यह एक बड़ा बदलाव होगा। ऐसे में क्या धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति से निजात मिलेगी ? क्या भाजपा विकास, रोजगार, शिक्षा, अर्थव्यवस्था और सुशासन को राजनीतिक विमर्श का केंद्र बनाएगी? और सबसे महत्वपूर्ण क्या हिंदू-मुस्लिम संबंधों को चुनावी लाभ-हानि के चश्मे से देखना बंद किया जाएगा? भारत की पहचान केवल बहुसंख्यक समाज से नहीं, बल्कि उसकी विविधता से बनी है। इस देश में मंदिर भी हैं, मस्जिदें भी, गुरुद्वारे भी और गिरजाघर भी। इसलिए यदि संघ और उससे वैचारिक रूप से जुड़े राजनीतिक नेतृत्व की दिशा वास्तव में समावेशी राजनीति की ओर बढ़ती है तो अगला स्वाभाविक सवाल संविधान को लेकर होगा। भागवत का अमेरिका दौरा ऐसे समय हुआ जब RSS अपने शताब्दी वर्ष में वैश्विक स्तर पर अपनी छवि और संवाद को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। आरएसएस और भाजपा के रिश्ते को देखते हुए संघ प्रमुख के विचारों का राजनीतिक असर स्वाभाविक रूप से चर्चा का विषय बनेगा। यदि संघ की सोच वास्तव में सामाजिक समरसता और धार्मिक सद्भाव की दिशा में अधिक स्पष्ट रूप से आगे बढ़ती है, तो भाजपा के सामने भी उसी दिशा में अपनी राजनीति को ढालने की चुनौती होगी। इस बीच रिपोर्टों से यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्यक्तिगत सहमति या किसी मध्य-पूर्व, एशिया सैन्य गठबंधन ने इस दौरे को राजनीतिक रूप से प्रेरित किया। ऐसे दावे के लिए ठोस प्रमाण आवश्यक होंगे। एक और दिलचस्प पहलू यह है कि भागवत के इन बयानों को केंद्र सरकार की ओर से कोई विशेष राजनीतिक महत्व मिलता दिखाई नहीं दिया। क्या सरकार इसे संघ प्रमुख का सामाजिक-सांस्कृतिक संदेश मानती है? या फिर राजनीतिक स्तर पर अभी कोई स्पष्ट बदलाव नहीं चाहती इसका जवाब आने वाला समय देगा।6a641bf93a0da mohan bhagwat 251411450 16x9 1 IMG 20260903 WA0685

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