स्टेट कैंसर अस्पताल में शुरू होने जा रही रेडियोथेरेपी, कैंसर का होगा सटीक इलाज
महाकौशल, विंध्य और बुंदेलखंड के मरीजों को मिलेगी राहत

जबलपुर,यशभारत। महाकौशल, विंध्य और बुंदेलखंड के कैंसर मरीजों के लिए राहतभरी खबर है। नेताजी सुभाषचंद्र बोस मेडिकल कॉलेज परिसर स्थित स्टेट कैंसर अस्पताल में करीब 42 करोड़ रुपये लागत की अत्याधुनिक लीनियर एक्सीलेरेटर (लीनेक) मशीन और अन्य आधुनिक उपकरण पहुंच गए हैं। मशीनों का इंस्टॉलेशन कार्य शुरू हो गया है। इनके चालू होने के बाद मरीजों को आधुनिक रेडियोथेरेपी की सुविधा स्थानीय स्तर पर उपलब्ध होगी और इलाज के लिए लंबी प्रतीक्षा से राहत मिलेगी।
स्वस्थ ऊतकों को होगा कम नुकसान
विशेषज्ञों के अनुसार, लीनेक मशीन उच्च ऊर्जा वाली एक्स-रे (फोटॉन) और इलेक्ट्रॉन बीम के माध्यम से ट्यूमर पर सटीक रेडिएशन करती है। इससे कैंसर कोशिकाएं नष्ट होती हैं, जबकि आसपास के स्वस्थ ऊतकों को न्यूनतम नुकसान पहुंचता है। आधुनिक तकनीक के कारण उपचार अधिक प्रभावी और सुरक्षित माना जाता है।
सीटी सिमुलेटर से बनेगी सटीक उपचार योजना
स्टेट कैंसर अस्पताल को लीनेक मशीन के साथ अत्याधुनिक सीटी सिमुलेटर भी मिला है। इस मशीन का उपयोग रेडिएशन थेरेपी की योजना तैयार करने के लिए किया जाता है। इसके जरिए ट्यूमर का आकार, गहराई और सटीक स्थान निर्धारित किया जाता है, जिससे केवल कैंसर प्रभावित हिस्से पर ही रेडिएशन दिया जाता है और स्वस्थ अंग सुरक्षित रहते हैं।
6 से 9 महीने में शुरू होगी सुविधा
अस्पताल अधीक्षक डॉ. लक्ष्मी सिंगोतिया ने बताया कि लीनेक मशीन और सीटी सिमुलेटर के इंस्टॉलेशन में लगभग 6 से 9 महीने का समय लगेगा। दोनों मशीनें शुरू होने के बाद मरीजों को अत्याधुनिक उपचार के लिए नागपुर, इंदौर, मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
रोजाना बड़ी संख्या में पहुंच रहे मरीज
स्टेट कैंसर अस्पताल की ओपीडी में प्रतिदिन 100 से 125 मरीज उपचार के लिए पहुंच रहे हैं। वहीं रोजाना 70 से 80 मरीजों की रेडियोथेरेपी (सिंकाई) और 40 से 50 मरीजों की कीमोथेरेपी की जा रही है। सीमित संसाधनों के कारण अब तक कई मरीजों को रेडियोथेरेपी के लिए लगभग एक माह तक इंतजार करना पड़ता था।
कैसे काम करती है लीनेक मशीन
लीनेक मशीन ट्यूमर के आकार और गहराई का सटीक आकलन कर हाई-एनर्जी रेडिएशन बीम सीधे कैंसर कोशिकाओं पर केंद्रित करती है। इस तकनीक में कई मामलों में सर्जरी की आवश्यकता कम हो जाती है। इलाज के दौरान दर्द और दुष्प्रभाव भी अपेक्षाकृत कम होते हैं तथा स्वस्थ ऊतक सुरक्षित रहने से मरीजों के जल्द स्वस्थ होने की संभावना बढ़ जाती।








