मेरा यादगार केस: सुई-धागे से सिली लाश की पोटली, न नाम न सुराग… जब इंस्पेक्टर सुबोध गौतम ने 48 घंटे में बेनकाब किया का अदृश्य कातिल

मेरा यादगार केस: सुई-धागे से सिली लाश की पोटली, न नाम न सुराग… जब इंस्पेक्टर सुबोध गौतम ने 48 घंटे में बेनकाब किया का अदृश्य कातिल
अरविंद कुमार कपिल
भोपाल,यश भारत। यह कहानी मध्य प्रदेश पुलिस के एक ऐसे जांबाज अफसर की है, जिसकी रगों में खाकी का जुनून दौड़ता है। साल 2012-13 में सब इंस्पेक्टर की भर्ती परीक्षा पास कर पुलिस महकमे में कदम रखने वाले और ग्वालियर की मिट्टी में पले-बढ़े इंस्पेक्टर सुबोध गौतम आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। वर्दी पहनने का जुनून और जनता की सेवा करने का उद्देश्य लेकर आए सुबोध गौतम ने भोपाल के हबीबगंज थाने से पुलिसिंग की बारीकियां सीखीं और अपने करियर में कई पेचीदा मामलों का पर्दाफाश किया। वर्तमान में देवास जिले में अपनी सेवाएं दे रहे इंस्पेक्टर गौतम ने यश भारत के साथ अपने सेवाकाल के सबसे खौफनाक और रूह कंपा देने वाले ब्लाइंड मर्डर की इनसाइड स्टोरी साझा की। एक ऐसा कत्ल, जिसकी टाइमलाइन और शातिर प्लानिंग किसी साइकोलॉजिकल थ्रिलर फिल्म जैसी थी…
सवाल: सुबोध जी, शाहजहानाबाद का यह मामला आम कत्ल की वारदातों से कितना अलग था कि यह आपके लिए सबसे यादगार केस बन गया? पुलिस को इसकी भनक कैसे लगी?
जवाब: यह केस पुलिसिंग की किताबों में पढ़ाए जाने वाले किसी सस्पेंस थ्रिलर जैसा था। 6 मार्च 2019 की उस रात को मैं कभी नहीं भूल सकता। ईदगाह हिल्स की पीएनबी कॉलोनी के पानी फिल्टर प्लांट के पास एक सूने प्लॉट में चादर और कंबल में लिपटी एक अजीब, भारी पोटली पड़ी थी। वहां से गुजरने वाले कुछ राहगीरों को उस संदिग्ध पोटली को देखकर गहरा संदेह हुआ। उन्होंने तुरंत हिम्मत दिखाकर शाहजहानाबाद पुलिस को इसकी सूचना दी।
जब हमारी टीम मौके पर पहुंची और हमने उस पोटली को देखा, तो हम दंग रह गए। कातिल ने साक्ष्य छिपाने के लिए कंबल को चारों तरफ से सूती धागे से इतनी बारीकी और मजबूती से सिल रखा था कि खून की एक बूंद भी बाहर न आए। जब हमने उस सिलाई को उधेड़ा, तो अंदर एक 35 वर्षीय अज्ञात युवक की गला रेती हुई लाश थी। मौके पर न कोई चश्मदीद था, न कोई सुराग। ऐसे ‘जीरो इनपुट’ वाले अंधे कत्ल को सुलझाना सीधे तौर पर कातिल के शातिर दिमाग को चुनौती देना था।
सवाल: इस केस का सबसे बड़ा ब्लाइंड स्पॉट तो मृतक की पहचान ही थी। जब मौके पर कोई सुराग नहीं था, तो पुलिस ने उस लापता इंसान की पहचान कैसे की?
जवाब: आपने बिल्कुल सही और सबसे बुनियादी सवाल पूछा। किसी भी अंधे कत्ल में जब तक मृतक की पहचान न हो, तब तक कातिल तक पहुंचना नामुमकिन होता है। हमारे पास न कोई दस्तावेज था और न ही कोई गवाह। चेहरा इस कदर अनजान लग रहा था कि पहचान छुपाना ही कातिल का सबसे बड़ा हथियार बन चुका था।
जब आपके पास कोई सुराग न हो, तो समय ही आपका सबसे बड़ा हथियार होता है। हमने बिना वक्त गंवाए मर्ग दर्ज किया। मैंने अपनी टीम के साथ तकनीकी सर्विलांस और मुखबिर तंत्र को पूरी ताकत से एक्टिव किया। इसके साथ ही, हमने भोपाल और आसपास के जिलों के थानों से लापता लोगों की लिस्ट खंगालनी शुरू की।
इसी दौरान हुलिए के आधार पर हमें एक हालिया गुमशुदगी की रिपोर्ट का मिलान मिला। हमने बिना वक्त गंवाए मृतक के परिजनों से संपर्क किया। जब पप्पू कुशवाह की पत्नी ने शव की शिनाख्त की, तब जाकर इस केस का सबसे बड़ा सस्पेंस खुला। पहचान होते ही कातिल का पूरा ताना-बाना बिखर गया, क्योंकि मृतक के परिजनों से पूछताछ के बाद ही राजेश मालवीय का नाम हमारी रडार पर आया, जो घटना के बाद से ही रहस्यमय तरीके से गायब था।
सवाल: जब पुलिस ने घेराबंदी कर राजेश मालवीय को दबोचा, तो पूछताछ में क्या सनसनीखेज सच सामने आया? उसने इस खौफनाक वारदात को कैसे और कब अंजाम दिया?
जवाब: जब हमने राजेश को हिरासत में लेकर कड़ाई से पूछताछ की, तो जो सच सामने आया उसने अनुभवी पुलिसकर्मियों के भी होश उड़ा दिए। यह काम किसी बड़े गैंग का नहीं, बल्कि अकेले राजेश मालवीय का था, जिसने आपसी रंजिश में इस खौफनाक वारदात को अंजाम दिया था। हालांकि, इस पूरी साज़िश और हत्या को छुपाने में उसने अपने सगे चाचा के साथ मिलकर ताना-बाना बुना था।
राजेश ने कबूल किया कि वह असल में किसी और की हत्या करने का प्लान बना रहा था और उसने पूरी तैयारी कर रखी थी, लेकिन उस रात ऐन वक्त पर सामने पप्पू कुशवाह आ गया। राजेश ने पहले पप्पू को अपने जाल में फंसाया, कमरे में साथ बैठकर शराब पी और फिर उसे नशा कराकर पूरी तरह बांध दिया। जब पप्पू बेसुध हो गया, तो राजेश ने धारदार हथियार से उसका गला रेतकर शाम के वक्त ही कत्ल कर दिया था।
सवाल: कत्ल करने के बाद लाश को बाकायदा सुई-धागे से सिलकर पोटली बनाना… यह तो किसी सामान्य अपराधी की सोच से परे है। इसके पीछे की साइकोलॉजी और हकीकत क्या थी?
जवाब: हाँ यही इस केस का सबसे सनसनीखेज और दिमाग हिला देने वाला हिस्सा है। अमूमन कत्ल के बाद आरोपी लाश को ठिकाने लगाने की जल्दी में होते हैं, लेकिन यहाँ कातिल का शातिराना दिमाग अलग ही स्तर पर चल रहा था। देर शाम को बेरहमी से कत्ल करने के बाद राजेश जरा भी नहीं घबराया। वह देर रात का इंतजार करने के लिए कमरे में लाश के पास ही बैठा रहा। उसने सुई-धागा उठाया और ठंडे दिमाग से लाश को कंबल में लपेटकर चारों तरफ से सिल दिया, ताकि वो बिल्कुल कपड़ों की पोटली जैसी दिखे।
चूंकि राजेश पेशे से कपड़े प्रेस करने का काम करता था और रोज कपड़ों के बड़े-बड़े गट्ठर अपनी गाड़ी पर लादकर ले जाता था, इसलिए सुई-धागे से बड़े गट्ठर सिलना उसके रोज के हुनर का हिस्सा था। उसने अपने इसी हुनर का इस्तेमाल इस खौफनाक वारदात को छिपाने के लिए किया। वह पूरी शाम अंधेरा होने और सड़कों के सूनी होने का इंतजार करता रहा। फिर देर रात का इंतजार कर, वह लाश की उसी सिली हुई पोटली को गाड़ी पर लादकर निकला ताकि किसी को शक न हो। रास्ते में किसी को भनक तक नहीं लगी कि जिसे वो कपड़ों का गट्ठर समझ रहे हैं, उसमें एक इंसान की लाश है। उसने मौका देखकर उसे ईदगाह हिल्स, फिल्टर प्लांट के पास फेंका और फरार हो गया। उसे लगा कि वह बच गया, लेकिन राहगीरों की मुस्तैदी और हमारी टीम की मेहनत रंग लाई। 48 घंटे के भीतर आरोपी पुलिस की गिरफ्त में था।
युवाओं को संदेश: खाकी पहनने का जुनून है तो आएं, पर डिजिटल चुनौतियों के लिए तैयार रहें
इंटरव्यू के आखिरी पड़ाव में जब हमने इंस्पेक्टर सुबोध गौतम से पूछा कि आज की पुलिसिंग पहले से कितनी बदल गई है और नए लड़कों के लिए क्या संदेश है,
तो उन्होंने कहा: जो युवा पुलिस में आने की सोच रहे हैं, उनका बिल्कुल स्वागत है। आएं और पुलिस में अपनी सेवा दें, यह सिर्फ नौकरी नहीं बल्कि देश सेवा का सबसे बेहतरीन जरिया है। लेकिन एक बात याद रखें पहले की पुलिसिंग में और अब की पुलिसिंग में जमीन-आसमान का फर्क आ चुका है। आज की सबसे बड़ी चुनौती सायबर अपराध है, जिसमें डिजिटल अपराध लगातार बढ़ते जा रहे हैं। इसलिए आज के युवाओं को शारीरिक ताकत के साथ-साथ तकनीकी रूप से भी खुद को अपग्रेड करना होगा।







