
जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर खंडपीठ ने बहुचर्चित ट्विशा शर्मा दहेज मृत्यु प्रकरण में बड़ा फैसला सुनाते हुए सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी स्म्ति गिरिबाला सिंह को दी गई अग्रिम जमानत निरस्त कर दी है। न्यायमूर्ति देवनारायण मिश्रा की एकलपीठ ने भोपाल की 10वीं अतिरिक्त सत्र अदालत द्वारा 15 मई 2026 को पारित अग्रिम जमानत आदेश को गलत ठहराते हुए कहा कि मामले में उपलब्ध साक्ष्यों, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, व्हाट्सएप चैट और गवाहों के बयानों की गंभीरता को पर्याप्त रूप से नहीं परखा गया। मामला मृतका ट्विशा शर्मा की संदिग्ध मौत से जुड़ा है, जिसकी शादी 9 दिसंबर 2025 को समार्थ सिंह से हिंदू रीति-रिवाज से हुई थी। 12 मई 2026 को ट्विशा की उसके ससुराल में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। प्रारंभिक जांच के बाद कटारा हिल्स थाना भोपाल में अपराध दर्ज किया गया, जिसे बाद में सीबीआई को सौंप दिया गया।
व्हाट्सएप चैट और बयानों में प्रताड़ना के आरोप-सुनवाई के दौरान मृतका के पिता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा ने अदालत के समक्ष कई व्हाट्सएप चैट प्रस्तुत किए। इनमें मृतका द्वारा अपने परिजनों को भेजे गए संदेशों में पति और ससुराल पक्ष पर मानसिक प्रताड़ना, चरित्र पर संदेह और गर्भपात के लिए दबाव डालने के आरोप लगाए गए थे। मृतका ने अपने संदेशों में यह भी लिखा था कि उसे न तो सामान्य जीवन जीने दिया जा रहा है और न ही वह मानसिक रूप से शांत रह पा रही थी।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में चोटों का उल्लेख-अदालत ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट का भी उल्लेख किया, जिसमें फांसी के अलावा मृतका के शरीर पर छह अन्य चोटों के निशान पाए गए थे। कोर्ट ने माना कि ये चोटें सामान्य नहीं थीं और जांच एजेंसी द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट के अनुसार शव को उतारने या अस्पताल ले जाने के दौरान नहीं लगी थीं।
जांच में सहयोग नहीं करने का आरोप-राज्य शासन और सीबीआई की ओर से अदालत में कहा गया कि अग्रिम जमानत मिलने के बाद भी आरोपी जांच एजेंसियों के समक्ष सहयोग के लिए उपस्थित नहीं हुईं। कई नोटिस जारी होने के बावजूद बयान दर्ज कराने में सहयोग नहीं किया गया। अभियोजन पक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि मामले से जुड़े सीसीटीवी फुटेज के चयनित हिस्से सोशल मीडिया पर जारी किए गए, जिससे जांच प्रभावित हो सकती थी।
ट्रायल कोर्ट पर महत्वपूर्ण तथ्यों की अनदेखी का आरोप-हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों और परिवारजनों के बयानों पर पर्याप्त विचार किए बिना केवल बचाव पक्ष द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों को आधार बनाकर अग्रिम जमानत दे दी। अदालत ने कहा कि मृतका के परिजनों के बयानों में स्पष्ट रूप से दहेज प्रताड़ना और गर्भपात के लिए दबाव बनाए जाने के आरोप लगाए गए थे।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला-सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि दहेज मृत्यु जैसे गंभीर मामलों में अग्रिम जमानत अत्यंत सावधानी से दी जानी चाहिए। यदि जमानत आदेश प्रासंगिक तथ्यों की अनदेखी कर पारित किया गया हो तो उच्च न्यायालय उसे निरस्त कर सकता है।
हाईकोर्ट ने जमानत आदेश किया निरस्त-सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने भोपाल की 10वीं अतिरिक्त सत्र अदालत द्वारा पारित अग्रिम जमानत आदेश को निरस्त करते हुए दोनों याचिकाएं स्वीकार कर लीं। साथ ही मामले की आगे की जांच जारी रखने के निर्देश दिए गए।







