गोविंद नामदेव: सागर से सागर किनारे तक का सफर ! प्राइम टाइम विथ आशीष शुक्ला में मुंबई यशभारत कार्यालय में खास बातचीत
साधना और सफलता की प्रेरक कहानी

मुंबई,यशभारत। मध्य प्रदेश के सागर जिले की माटी से निकलकर सागर किनारे बसी मुंबई को अपनानेवाले और भारतीय सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाने वाले गोविंद नामदेव आज सशक्त अभिनय के पर्याय बन चुके हैं। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से प्रशिक्षण प्राप्त करने और रंगमंच से अपने अभिनय जीवन की शुरुआत करनेवाले गोविंद नामदेव ने हर मंच पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। यशभारत के कार्यालय पहुंचे बहुमुखी प्रतिभा के धनी गोविंद नामदेव से ‘यश भारत’ के संस्थापक आशीष शुक्ला ने विशेष बातचीत की, जिनकी जीवन यात्रा संघर्ष, साधना और सफलता की प्रेरक कहानी है।
आप सागर जिले से हैं और यहां सागर किनारे मुंबई आपकी कर्मभूमि है। तो हम सागर से सागर किनारे तक की चर्चा से ही साक्षात्कार शुरू करते हैं। इस पर तो लंबी चर्चा हो जाएगी (हंसते हुए)। देखिए, हम एक स्केन करें गृह प्रदेश के हैं। एक ही परिवार के है इसलिए हम एक पारिवारिक चर्चा करते हैं।

मुंबई आपके दिमाग में कब आई?
यह सब संयोग है। सागर से दिल्ली और दिल्ली से मुंबई, यह एक लाइन बनी। 20 साल दिल्ली और 35 साल यहां मुंबई में। 55 साल में सागर से बाहर रहा।
हम जिस परिवेश में रहते हैं, जबलपुर और सागर में बहुत गहरा नाता है। आय सागर से दूर रहे और एक दौर था, जब संपर्क के लिए मोबाइल आदि नहीं था। चिट्ठी के दौर में आप कैसे संपर्क में रहे?
मैं सातवीं क्लास तक सागर में पड़ा। आठवीं से ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई मैंने दिल्ली में की। बहुत सारे ऐसे कारण थे, जिनकी वजह से मैं वहां से निकलना चाहता था। ईश्वर ने साथ दिया और मैं वहां से निकला। दरअसल, मैं कुछ खास करना चाहता था। कुछ स्पेशल बनना चाहता था। जैसे मेरे बड़े भाई सरकारी कर्मचारी थे। सब लोग बहुत खुश थे। यह लगभग 1968 या 69 की बात होगी, लेकिन मुझ में जागरुकता थी। मुझे पढ़ाई, नौकरी, शादी और बच्चों वाली जिंदगी नहीं जीनी थी। मुझे कुछ अलग करना था।
आपकी यात्रा आगे कैसे बड़ी?
दिल्ली के स्कूली जीवन में मैं कल्चरल एक्टिविटी में बहुत आगे रहता था। यही सब वह चीजें हैं, जिन्होंने मुझे मुंबई की ओर धकेला। मैं नाटक लिखता था, कविताएं लिखता था, एक्टिंग करता था, भाषण करता था, कविताएं पढ़ता था और गाना गाता था। यह सब देखकर मुझे कल्चरल कमेटी का हेड बना दिया गया तो जिम्मेदारी आ गई कि प्रोग्राम होने पर मुझे उसमें हिस्सा लेना है। मैं एक्टिंग करता ही था। उस दौरान मैं अपनी मां को बहुत मिस करता था। इस पर मैंने एक सोलो परफॉर्मेंस बनाई। बाद में कई कार्यक्रमों में उस परफॉर्मेंस की डिमांड आने लगी। उस परफॉर्मेंस के आखिरी सीन में मैं असल में ही रोने लगता था। सब लोग हैरान हो जाते थे। यह सब देखकर एक बार प्रिंसिपल ने मुझे बुलाया और मुझे शाबाशी दी। उन्होंने कहा कि इसमें आप करियर बनाओगे तो बहुत सफल होगे। यह बात मेरे दिमाग में बैठ गई।
आपकी विधिवत ट्रेनिंग कैसे हुई?
जिस स्कूल में मैं पड़ता था, उसके पास ही नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा का इंस्टिट्यूट था। संयोग जुड़ते चले गए और नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में मेरा सिलेक्शन हो गया और मैंने यहां कोर्स किया। फिर मैंने आत्मचिंतन किया और सोचा कि मुंबई में मेरा कोई गॉडफादर तो है नहीं, तो मुझे ही अपने भीतर एक चिंगारी तैयार करनी पड़ेगी, जिससे लोग मुझे अपनी फिल्मों में लें।
मतलब एक जंपिंग पॉइंट की तरह
जी। इसलिए मैंने तय किया कि अब मुझे 10 साल रंगमंच करना पड़ेगा। उन सीनियर्स के साथ काम करना पड़ेगा जो कमाल का काम करते हैं। मनोहर सिंह, सुरेखा सिंह, पंकज कपूर आदि सीनियर थे। इनका एक ग्रुप था। जो भी अच्छे कलाकार होते थे, उनको उस ग्रुप में शामिल किया जाता था। ये लोग कमाल का काम करते थे। मैंने तय किया कि में 10 साल यहां काम करूंगा। लगभग 14 साल में एनएसडी में था।
आपको पहली फिल्म कौन सी मिली?
पहली फिल्म सरदार थी जो सरदार पटेल पर आधारित थी और केतन मेहता ने बनाई थी। उसमें मुझे एक बढ़िया किरदार मिला। फिर शोला और शबनम से मेरा नाम चमका। इसी दौरान मुझे बैंडिट क्वीन मिली और उसकी वजह से मुझे आरके बैनर की प्रेम ग्रंथ मिली। उसके बाद मैंने चार बड़ी कमर्शियल फिल्में साइन की। फिर यह सिलसिला चलता रहा।
आपने एक किताब लिखी जिसका विमोचन अमिताभ बच्चन ने किया। वह किताब बड़ी चर्चित रही। कुछ और भी सोचा है?
एक और क्रिएशन है। मैंने शो भी किए। अब इसे पूरे मध्य प्रदेश में फैलाएंगे।
आप अपनी आनेवाली फिल्मों के बारे में कुछ बताएं।
जिनी वेड्स सनी 2 एक रोमांस, कॉमेडी और ड्रामा वाली फिल्म है। इसके अलावा वो लड़की है कहां ऑब्जेक्शन माय लॉर्ड, समर्पण, वेलकम 3 की भी बात हुई है। इसके अलावा भी दो फिल्में आने वाली हैं।
इंडस्ट्री में एक लंबा अरसा बिताने के बाद आपका अनुभव कैसा रहा ? वर्तमान में जो युद्ध की स्थिति बनी हुई है, इस पर आपके क्या विचार हैं?
जब हम बच्चों और औरतों की चीखें सुनते हैं तो दिल दहल उठता है। जब बातचीत के द्वारा समस्या का हल निकाला जा सकता है तो युद्ध क्यों?
आपने होली पर एक संदेश भी दिया था,जो बहुत चर्चा में रहा।
हां, जब युद्ध की शुरुआत हुई थी तब होली का समय था। उस समय होली की शुभकामनाएं देने के साथ ही मैंने यह कविता लिखी लिखी थी-
युद्ध थमे मासूमों की जान बचे,युग चाहे होवे कलियुग राक्षसों का नाश हो इंसानियत को सांस मिले।
इतना तो मैंने सोचा भी नहीं था। इस लेवल का नहीं सोचा था कि दुनिया मुझे जानेगी।
आपकी भविष्य की क्या योजनाएं हैं?
अभी तीन-चार साल और काम करना है। उसके बाद अपने इंस्टिट्यूट के लिए काम करूंगा, जिसकी तैयारी हो चुकी है। लगभग 2030 में मैं मध्य प्रदेश में शिफ्ट हो जाऊंगा। मध्य प्रदेश मेरा परिवार है। मुझे अपने लोगों के बीच में रहना अच्छा लगता है। उनके साथ ऐसा लगता है कि मैं अपने परिवार के बीच में हूं। जब मध्य प्रदेश आ जाऊंगा तो मिलकर खूब काम करेंगे।






