भोपालमध्य प्रदेश

मंडला के जंगलों से भोपाल की गलियों तक, वो एक केस जिसने रातों की नींद उड़ा दी थी

मंडला के जंगलों से भोपाल की गलियों तक, वो एक केस जिसने रातों की नींद उड़ा दी थी

थाना प्रभारी महेश लिल्हारे के यादगार पल

अरविंद कुमार कपिल
​भोपाल, यश भारत। साल 2013, जब एक ऊर्जावान युवक ने विज्ञान की किताबों को पीछे छोड़ खाकी वर्दी पहनी, तो लक्ष्य साफ था न्याय। आज 13 साल बाद, अयोध्या नगर थाना प्रभारी महेश लिल्हारे की गिनती उन अफसरों में होती है जो पहेली बन चुके केस सुलझाने में माहिर हैं। बालाघाट से शुरू हुआ यह सफर मंडला के नक्सल मोर्चों से होता हुआ आज राजधानी के सबसे चुनौतीपूर्ण इलाकों तक पहुँच गया है।
​हाल ही में उनसे हुई बातचीत में उन्होंने अपनी नौकरी की शुरुआत और उस गंभीर मामले का जिक्र किया, जो उनके जीवन का सबसे यादगार हिस्सा बन गया।

​सवाल: अपनी नौकरी की शुरुआत और मंडला के उन दिनों को आप कैसे याद करते हैं?

जवाब: मेरी पुलिसिंग की असल नींव मंडला के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में पड़ी। वहां दो साल की सर्विस किसी ट्रेनिंग से कम नहीं थी। घने जंगलों के बीच नक्सलियों की आहट और सीमित संसाधनों में ड्यूटी करना वहां मैंने सीखा कि धैर्य और सटीक सूचना का क्या महत्व है। वहां की विषम परिस्थितियों ने मुझे मानसिक रूप से इतना मजबूत बना दिया कि आज शहर के पेचीदा ब्लाइंड केस सुलझाते वक्त मैं कभी विचलित नहीं होता।

​सवाल: आपके करियर का वह सबसे गंभीर और यादगार मामला कौन सा है, जिसने आपको झकझोर दिया?

​जवाब: वैसे तो कई केस हैं, लेकिन सीरियल कटर मैन का मामला मेरे लिए सबसे गंभीर और यादगार रहा। यह केवल एक अपराध नहीं था, यह पूरे शहर की बेटियों की आजादी पर हमला था। सागर में 6 और भोपाल में 4 लड़कियों पर सरेराह कटर से हमला करने वाले उस साइको अपराधी ने आतंक फैला रखा था। शाम होते ही सड़कें खाली होने लगी थीं। एक पुलिस अधिकारी के रूप में, यह मेरी वर्दी की साख का सवाल था।

​सवाल: उस केस के दौरान वह कौन सा पल था जब आपको लगा कि आप हार नहीं मान सकते?

​जवाब: जब मैंने उन मासूम बच्चियों और महिलाओं के चेहरे पर वह खौफ देखा। अपराधी का कोई मोटिव नहीं था, वह बस कुंठा निकालने के लिए हमला करता था। हमने 150 पुलिसकर्मियों की सीक्रेट टीम बनाई। सादी वर्दी में मेरे जवान ऑटो वाले, राहगीर और रेहड़ी वाले बनकर चप्पे-चप्पे पर तैनात थे। हम सोए नहीं थे, बस एक ही धुन थी कि उसे दबोचना है।

​सवाल: वह यादगार गिरफ्तारी कैसे हुई?

​जवाब: वह रात मुझे हमेशा याद रहेगी। हमने पैटर्न पकड़ा और घेराबंदी की। जब हमने संदिग्ध को पकड़ा और उसकी जेब से वही सर्जिकल कटर निकला, तो मेरी टीम की आँखों में जो चमक थी, वह अद्भुत थी। उस गिरफ्तारी के साथ ही शहर से एक अदृश्य दुश्मन का खौफ खत्म हो गया। वह पल मेरी सर्विस का सबसे संतोषजनक और यादगार क्षण है।

​सवाल: एक अनुभवी अफसर के नाते, आप आज के नए पुलिसकर्मियों को क्या कहेंगे?

​जवाब: पुलिस की नौकरी सिर्फ ड्यूटी नहीं, एक जिम्मेदारी है। चाहे नक्सल मोर्चा हो या शहर का हाई-टेक क्राइम, आपकी सफलता आपके नेटवर्क और धैर्य पर टिकी है। अपराधी कितना भी शातिर हो, वह सुराग जरूर छोड़ता है; बस हमें एक वैज्ञानिक की तरह उसे ढूंढना होता है।

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