भोपालमध्य प्रदेश

बिहार चुनाव: मोहन यादव का प्रचार बना तेजस्वी के लिए चुनौती

बिहार चुनाव: मोहन यादव का प्रचार बना तेजस्वी के लिए चुनौती

सूर्यकांत चतुर्वेदी

 भोपाल। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव बिहार चुनाव में प्रमुख प्रतिद्वंद्वी दल राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी के लिए बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं। इसकी वजह है, उनका बिहार में भारतीय जनता पार्टी एवं एनडीए के घटक दलों के प्रत्याशियों के पक्ष में चुनाव प्रचार का मोर्चा संभालना। डॉ यादव को केन्द्रीय नेतृत्व ने इस बार चुनाव प्रचार के लिए जिस तरह से अपना भरोसा जताते हुए स्टार प्रचारकों की सूची में जगह दी है, उसकी भी अपनी वजह है। इसके अलावा अन्य भी कई कारण हैं, जिसकी वजह से उनका चुनाव प्रचार में उतरना पार्टी के लिए फायदे वाला माना जा रहा है।

बिहार चुनाव भाजपा के साथ ही एनडीए के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इसकी वजह से पूरे देश की निगाहें इस चुनाव के परिणामों पर अभी से लगी हुई है। इस चुनाव के परिणाम को अभी से राजनीतिक विश्लेषक 2029 में होने वाले लोकसभा चुनाव के साथ ही उत्तर प्रदेश में दो साल बाद होने वाले विधानसभा के लिटमस टेस्ट के रुप में देखा जा रहा है। बिहार ऐसा राज्य है जो लोकसभा चुनाव के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है। इस चुनाव परिणाम से उत्तर प्रदेश की राजनीतिक दिशा तय होगी। इसकी वजह है बिहार व उप्र में एक जैसे राजनीतिक समीकरण होना। बिहार में जहां लालू यादव परिवार भाजपा के लिए बड़ी चुनौती है, तो उप्र में भी स्व. मुलायम सिंह यादव का परिवार।  बिहार ऐसा राज्य है, जहां पर 14.5 फीसदी मतदाता यादव वर्ग से आते हैं। इस वर्ग के मतदाताओं का प्रदेश की कुल 243 विधानसभा सीटों में से करीब एक सैकड़ा सीटों पर बड़ा प्रभाव माना जाता है। यानी जिस दल के साथ यादव मतदाता जाते हैं, उसकी जीत करीब-करीब तय हो जाती है। इन मतदाताओं को पार्टी के पक्ष में करने के लिए ही इस समय डां यादव लगातार बिहार चुनाव में चुनावी सभाएं कर रहे हैं। यह चुनावी सभाएं भी खासतौर पर उन क्षेत्रों में हो रही हैं, जो यादव प्रभाव वाली मानी जाती हैं। इन सभाओं में अच्छी खासी भीड़ उमड़ रही है, जिसे पार्टी के लिए अच्छा संकेत माना जा रहा है।

सीएम यादव अब तक आधा दर्जन सीटों पर चुनावी प्रचार कर कर चुके हैं। अहम बात यह है कि पार्टी की ओर से जिन पांच नेताओं की सबसे अधिक मांग चुनाव प्रचार के लिए है, उनमें मप्र के मुख्यमंत्री डॉ यादव भी शामिल हैं। डॉ यादव के रुप में पार्टी को एक ऐसा चेहरा मिला है, जो न केवल बिहार बल्कि उप्र में भी यादव वोट बैंक को पार्टी के पक्ष में करने की क्षमता रखता है। बिहार में यादव वोट बैंक लंबे समय से राष्ट्रीय जनता दल के साथ मजबूती से जुड़ा रहा है। पहले लालू प्रसाद यादव और अब उनके बेटे तेजस्वी यादव के नेतृत्व में राजद के अपने इस कोर वोटर पर लालू और तेजस्वी का भरोसा इतना गहरा है कि अगर राजद किसी गैर-यादव उम्मीदवार को भी टिकट देती है, तो यादव मतदाता उसे पूरा समर्थन देते हैं। यह समर्थन केवल राजद तक सीमित नहीं रहता, यह वोट राजद के सहयोगी दलों को भी आसानी से ट्रांसफर हो जाता है। मुस्लिम वोटों के साथ मिलकर, यह यादव वोट बैंक एमवाई का समीकरण’ बनाता है, जो चुनावी लड़ाई में गठबंधन को लगभग अपराजेय स्थिति में ला खड़ा करता है। बिहार की कुल आबादी में मुस्लिम जनसंख्या की भागीदारी लगभग 17.7 प्रतिशत  है। यह वर्ग राज्य के चुनावों में एक निर्णायक भूमिका में रहता है। वैसे तो मुस्लिम समुदाय सामाजिक रूप से अपर कास्ट, पिछड़ा वर्ग, अति पिछड़ा वर्ग और अनुसूचित जाति जैसे अलग-अलग समूहों में बंटा हुआ है। हालांकि ज्यादातर मुस्लिम एससी और एसटी वर्ग में आते हैं। इसके बाद भी इस समाज के मतदाता चुनाव के दौरान एक समुदाय की तरह वोट करते हैं। ऐसे में मप्र के सीएम गेमचेंजर के रुप में साबित हो सकते हैं।

-आधा सैकड़ा सीटों पर प्रचार:

मप्र के मुख्यमंत्री मोहन यादव बिहार की आधा सैकड़ा से अधिक सीटों पर चुनाव प्रचार करने जा रहे हैं। इसकी वजह से वे अब एक पखवाड़े के दौरान लगातार बिहार का दौरा करते रहेंगे। इसकी वजह है भाजपा और एनडीए ने तय किया है कि उन्हें यादव और ओबीसी बाहुल्य सीटों पर चुनाव प्रचार में उतारा जाए। इन सीटों के बारे में कहा जाता है कि वे बिहार में किसी भी दल की सरकार बनाने और बिगाड़ने में अहम रोल अदा करती हैं। इन सीटों पर वे कई कई बार चुनावी सभाओं के साथ ही रैलियां आदि में भी भाग लेंगे। दरअसल, मुख्यमंत्री स्वयं यादव समाज से आते हैं। इसलिए भाजपा उन्हें यादव बाहुल सीटों पर बड़े चेहरे के रूप में उतारना चाहती है।

-यह भी है वजह: 
मुख्यमंत्री यादव हरियाणा और जम्मू में भी चुनावी प्रचार कर चुके हैं। उनके द्वारा हरियाणा की पांच सीटों पर प्रचार किया गया था, जहां चार सीटों पर भाजपा को जीत मिली थी। इसी तरह से जम्मू की जिस सीट पर वे प्रचार करने गए थे, वहां भी पार्टी को अच्छी खासी जीत मिल थी। उनके प्रचार के बाद सीटों पर जीत का प्रतिशत करीब 83 है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button