मेडिकल कॉलेज में 1.63 करोड़ का खेल : रसीद में पूरी रकम, बैंक पहुंचते-पहुंचते गायब हो जाता था हिस्सा
छह साल तक चलता रहा रकम का अंतर

जबलपुर, यशभारत। नेताजी सुभाषचंद्र बोस मेडिकल कॉलेज अस्पताल के कैश अनुभाग में रकम के गबन का ऐसा मामला सामने आया है, जिसमें रसीद बुक में पूरी राशि दर्ज होती थी, लेकिन बैंक खाते में जमा करते समय रकम कम कर दी जाती थी। अप्रैल 2020 से नवंबर 2025 के बीच फीस, आईपीडी और ओपीडी से वसूली गई राशि में यह अंतर लगातार बढ़ता गया और आखिरकार 1 करोड़ 63 लाख 76 हजार 465 रुपए तक पहुंच गया। कॉलेज प्रबंधन की जांच के बाद गढ़ा पुलिस ने रिटायर्ड कैशियर समेत पांच अधिकारियों-कर्मचारियों के खिलाफ मामला दर्ज किया है।
रसीद में रकम पूरी, बैंक में कम
पुलिस जांच में सामने आया कि कॉलेज में छात्रों की फीस, आईपीडी और ओपीडी से प्राप्त राशि की बाकायदा मनी रसीद बुक में एंट्री की जाती थी। यानी रिकॉर्ड में वसूली गई रकम पूरी दिखाई देती थी। इसके बाद राशि बैंक में जमा की जाती, लेकिन यहीं कथित गड़बड़ी का खेल शुरू होता था। रसीद बुक में दर्ज रकम से कम राशि बैंक में जमा की गई। लंबे समय तक यह अंतर पकड़ में नहीं आया और अलग-अलग लेनदेन में कम जमा की गई रकम जुड़ती चली गई।
जांच में खुला 1.63 करोड़ का अंतर
जब कॉलेज प्रबंधन को कैश और बैंक जमा राशि के हिसाब में गड़बड़ी की आशंका हुई तो जांच कमेटी गठित की गई। कमेटी ने मनी रसीद बुक में दर्ज रकम और बैंक में जमा राशि का मिलान किया। जांच में दोनों के बीच 1,63,76,465 रुपए का अंतर सामने आया। इसके बाद डीन डॉ. नवनीत सक्सेना ने गढ़ा पुलिस को प्रतिवेदन दिया।
पांच पर केस, तीन गिरफ्तार
गढ़ा पुलिस ने रिटायर्ड कैशियर मनोहर केवट, कैशियर साधना चन्द्रोल, सहायक ग्रेड-3 भानू सिंह शाक्यवार, कैशियर सह प्रभारी अरविंद धुर्वे और सहायक ग्रेड-3 विशाल सराठे के खिलाफ विभिन्न धाराओं में प्रकरण दर्ज किया है।
गढ़ा सीएसपी आशीष जैन के मुताबिक पुलिस ने भानू सिंह शाक्यवार, अरविंद धुर्वे और विशाल सराठे को गिरफ्तार किया हैं। न्यायालय ने तीनों को तीन दिन की पुलिस रिमांड पर भेजा है। पुलिस अब यह पता लगा रही है कि रिकॉर्ड में पूरी राशि दर्ज करने के बावजूद बैंक में कम रकम जमा करने का सिलसिला कैसे चलता रहा और 1.63 करोड़ रुपए की राशि में किसकी कितनी भूमिका थी।
छह साल तक चलता रहा रकम का अंतर
मामले की अवधि अप्रैल 2020 से नवंबर 2025 तक बताई गई है। इस दौरान कैश अनुभाग में अलग-अलग समय पर पदस्थ रहे कर्मचारियों की भूमिका जांच के दायरे में है। पुलिस अब मनी रसीद बुक, बैंक रिकॉर्ड और संबंधित दस्तावेजों का मिलान कर यह पता लगाने में जुटी है कि गबन की रकम किस-किस अवधि में और किस तरीके से निकाली गई।
यानी कागजों में हिसाब पूरा था, लेकिन बैंक तक पहुंचते-पहुंचते रकम कम हो जाती थी। छह साल तक चले इसी कथित ‘कैश गैप’ ने मेडिकल कॉलेज में 1.63 करोड़ रुपए के गबन का खुलासा कर दिया।







