सालभर गूंजते हैं भजन, जन्माष्टमी पर उमड़ता है आस्था का सैलाब
सौ साल पुराने लघुवृंदावन धाम में 12 महीने धार्मिक आयोजन, 4 सितंबर को जन्माष्टमी पर होंगे विशेष कार्यक्रम

सालभर गूंजते हैं भजन, जन्माष्टमी पर उमड़ता है आस्था का सैलाब
सौ साल पुराने लघुवृंदावन धाम में 12 महीने धार्मिक आयोजन, 4 सितंबर को जन्माष्टमी पर होंगे विशेष कार्यक्रम

कटनी, यशभारत। रीठी विकासखंड के ग्राम बांधा (इमलाज) स्थित श्री राधाकृष्ण मंदिर लघुवृंदावन धाम में सालभर धार्मिक आयोजनों का सिलसिला चलता रहता है। सौ वर्ष से अधिक पुराने इस मंदिर में आसपास के गांवों के साथ दूर-दराज से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। पूर्णिमा की महाआरती से लेकर जन्माष्टमी, राधाष्टमी, महाशिवरात्रि, शरद महोत्सव और अन्नकूट पर्व तक यहां धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। विशेष अवसरों पर मंदिर परिसर श्रद्धालुओं की भीड़ से गुलजार रहता है।
हर पूर्णिमा होती है महाआरती
मंदिर में प्रत्येक पूर्णिमा को विधि-विधान से महाआरती का आयोजन किया जाता है। इसके अलावा वर्षभर कथा-प्रवचन, भजन-कीर्तन और भंडारे भी होते हैं। धार्मिक आयोजनों के कारण मंदिर में पूरे साल श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रहती है। शांत ग्रामीण परिवेश और प्राचीन स्थापत्य के बीच स्थित यह धाम क्षेत्र में धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र बन चुका है।
जन्माष्टमी पर उमड़ेगी भीड़
4 सितंबर शुक्रवार को जन्माष्टमी के अवसर पर यहां विशेष आयोजन होंगे। सुबह भगवान श्रीराधाकृष्ण का अभिषेक और पूजन किया जाएगा। दोपहर 12 बजे से भजन प्रस्तुतियां शुरू होंगी, जबकि शाम 7 बजे से जबलपुर सहित अन्य स्थानों से आए भजन कलाकार अपनी प्रस्तुतियां देंगे। कार्यक्रम रात्रि तक चलेगा।
रात 12 बजे होगी जन्म झांकी
जन्माष्टमी महोत्सव का मुख्य आकर्षण रात 12 बजे भगवान श्रीकृष्ण की भव्य जन्म झांकी होगी। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है। मंदिर परिवार की ओर से श्रद्धालुओं से सपरिवार पहुंचकर भगवान श्रीराधाकृष्ण के जन्मोत्सव में शामिल होने की अपील की गई है।
लोकमान्यताओं से भी जुड़ा है मंदिर
लघुवृंदावन धाम केवल धार्मिक आयोजनों के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी पुरानी लोकमान्यताओं के लिए भी जाना जाता है। वर्ष 1929 में लगातार तीन रात मंदिर परिसर के आसपास बांसुरी जैसी मधुर धुन सुनाई देने की बात आज भी लोगों के बीच चर्चित है। वहीं मंदिर निर्माण में पत्थर ढोने वाले भूरा और चंदुआ नामक बैलों से जुड़ी कथा भी श्रद्धालुओं के बीच विशेष आस्था का विषय है।
1915 में शुरू हुआ था निर्माण
मंदिर का भूमिपूजन वर्ष 1915 में हुआ था और 1926 में निर्माण पूरा हुआ। इसके बाद 1927 में भगवान श्रीराधाकृष्ण की प्राण-प्रतिष्ठा विधि-विधान से कराई गई। मंदिर की प्राचीन पत्थर की नक्काशी, बेल-बूटे और आकर्षक झांकी आज भी श्रद्धालुओं का ध्यान खींचती है। यही वजह है कि लघुवृंदावन धाम धार्मिक आस्था के साथ क्षेत्र की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का भी महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है।







