दावों की पोल खोल रहे सरकारी स्कूल, जर्जर सडक़ और स्कूल भवन ने बच्चों से छीना शिक्षा का अधिकार, ग्रामीणों ने कहा : सात दिन में कार्यवाही नहीं हुई तो होगा जन आंदोलन

कटनी, यशभारत। एक ओर सरकार हर बच्चे को गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा और सबका साथ सबका विकास जैसे बड़े बड़े दावे कर रही है तो वहीं दूसरी ओर ढीमरखेड़ा विकासखण्ड के अंतर्गत ग्राम उमरपानी की हकीकत इन दावों की परतें उधेड़ती नजर आ रही है। यहां शिक्षा व्यवस्था बदहाल है। स्कूल भवन ध्वस्त हो चुका है। बच्चे निजी मकानों और अस्थायी स्थानों में पढऩे को मजबूर हैं, जबकि गांव तक पहुंचने वाली सडक़ इतनी जर्जर हो चुकी है कि छात्र, शिक्षक, मरीज और ग्रामीण सभी परेशानी झेल रहे हैं। जानकारी के मुताबिक जमीयत उलेमा ए कटनी एवं जनप्रतिनिधियों द्वारा कलेक्टर को सौंपे गए ज्ञापन में आरोप लगाया गया है कि लगभग 99 मासूम बच्चों का भविष्य सरकारी उदासीनता की भेंट चढ़ रहा है। पहली से आठवीं तक के विद्यार्थियों की पढ़ाई स्थायी विद्यालय भवन के अभाव में प्रभावित हो रही है। सवाल यह है कि क्या शिक्षा अब केवल सरकारी फाइलों और भाषणों तक ही सीमित रह गई है। ज्ञापन के अनुसार उमरपानी से बीजापुरी तिराहा तक लगभग 3 किलोमीटर सडक़ पूरी तरह जर्जर हो चुकी है। हालात ऐसे हैं कि हाईकूल और उच्च शिक्षा के लिए दूसरे गांव जाने वाले छात्र-छात्राओं का आवागमन लगभग ठप हो गया है। बरसात में यह रास्ता जानलेवा बन जाता है, जिससे सडक़ के साथ ही बच्चों का भविष्य भी टूट रहा है। सबसे गंभीर बात यह है कि 108 एम्बुलेंस और 112 जैसी आपात कालीन सेवाओं का समय पर पहुंचना भी मुश्किल हो गया है।
क्या कहते हैं ग्रामीण
ग्रामीणों का कहना है कि कई बार संबंधित अधिकारियों का ध्यान इस ओर आकर्षित कराया गया, लेकिन आज तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकला। यदि स्कूल भवन नहीं है तो अस्थायी भवन की व्यवस्था क्यों नहीं की गई। यदि सडक़ बदहाल है तो उसकी मरम्मत आज तक क्यों नहीं हुई। क्या बच्चों का भविष्य सरकारी प्राथमिकताओं में शामिल नहीं है। भारत का संविधान प्रत्येक बच्चे को शिक्षा का अधिकार देता है लेकिन उमरपानी के हालात इस संवैधानिक अधिकार पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। जब बच्चे सुरक्षित भवन में पढ़ ही नहीं पाएंगे और स्कूल तक पहुंचने का रास्ता भी नहीं होगा तो शिक्षा के अधिकार का वास्तविक अर्थ क्या रह जाएगा।
प्रशासन को दी चेतावनी
ज्ञापन में प्रशासन को चेतावनी दी गई है कि यदि सात दिनों के भीतर सुरक्षित एवं स्थायी स्कूल भवन, गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा व्यवस्था, विद्यालय संचालन, सडक़ निर्माण एवं अन्य आवश्यक सुविधाओं पर प्रभावी कार्यवाही नहीं हुई तो ग्रामीण संविधान और कानून के दायरे में रहकर शांतिपूर्ण धरना प्रदर्शन, जन जागरण रैली और जन आंदोलन करने को मजबूर होंगे। जिसकी समस्त जिम्मेदारी प्रशासन की होगी। क्या सरकार बच्चों के भविष्य को लेकर केवल भाषण देगी या धरातल पर भी संवेदन शीलता दिखाएगी। क्या मासूम बच्चों की पढ़ाई और उनकी सुरक्षा से बड़ा कोई मुद्दा हो सकता है। यदि शिक्षा, सडक़ और सुरक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं भी वर्षों तक उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं तो आखिर विकास के दावों का सच क्या है। अब देखने वाली बात है कि जिला प्रशासन इस गंभीर मामले को संवेदनशीलता से लेते हुए बच्चों के भविष्य को बचाने के लिए तत्काल ठोस कदम उठाता है या फिर एक और गांव सरकारी उपेक्षा का शिकार बनकर रह जाएगा।







