डिंडोरी । डिंडोरी जिले के करंजिया विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत भुसंडा के पोषक गाँव केरानार में जंगल किनारे स्थित प्राचीन मां देवी मंदिर धार्मिक स्थल स्थानीय सहित आसपास के क्षेत्रों के भक्तों के लिए वर्षों से आस्था का केंद्र बना हुआ हैं। यहां आसपास के गांवों सहित बड़ी संख्या में दूरदराज से श्रद्धालु माता की कृपा पाने पहुंच रहे हैं।
मान्यतानुसार इस स्थान पर जो भी भक्त सच्चे मन से माता की स्तुति कर कष्टों को दूर करने की प्रार्थना करता है, देवी मां ऐसी मनोकामना पूर्ण करती हैं। यहीं कारण हैं के माता के भक्तों की संख्या साल दर साल बढ़ रहीं हैं। लोग दूर दूर से आकर माता के दर्शन करते हैं। दरमियान वर्ष की दोनों नवरात्रि के मन्नत पूर्ण होने पर माता को दिए गए वचन को पूरा करने के लिए भक्तों द्वारा अखंड ज्योत जलाई जाती है। साथ ही जवारा भी बोए जातें हैं। इस बार भी मनोरथ पूर्ण होने पर श्रद्धालुओं ने चैत्र नवरात्रि में कलश की स्थापना कर मन्नत का ज्योत जलाकर मंदिर परिसर को जगमगाया हैं।
दूसरे राज्यों से भी पहुंचते हैं भक्तः ग्रामीणों का कहना हैं कि वैसे तो वर्ष भर लोग यहां दर्शन पूजन के लिए लेकिन चैत्र नवरात्र में अक्सर करके भक्तों आते हैं, जिसकी संख्या नवरात्र के पर्व पर बढ़ जाती हैं। नवरात्र के प्रारंभ से ही भक्त माता के दर्शनार्थ प्रतिदिन पहुंच रहें हैं। इस धार्मिक स्थल की लोकप्रियता और विशेषता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता हैं कि छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र आदि राज्यों के श्रद्धालु यहां आकर माता से मनोकामना के पूर्ण करने की प्रार्थना करते हैं। भक्तों ने बताया कि जो भी व्यक्ति माता के दरबार में सच्चे मन से मनोकामना करता हैं निःसंदेह माता उसकी मनोकामना को पूर्ण करतीं हैं। मनोकामना पूर्ण हो जाने पर भक्त माता के दरबार में माथा टेककर श्रद्धाभाव से तेल या घी की ज्योत जलाते हैं। मंदिर प्रबंधन ने ज्योत जलाने के लिए बकायदा अलग स्थान बना दिया है। ताकि श्रद्धालु को किसी प्रकार की असुविधा न हो। भक्त मनोकामना पूरी होने पर अपनी क्षमतानुसार विभिन्न धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन करने के साथ भंडारा प्रसाद वितरण भी करतें हैं। मंदिर के इतिहास के बारे में अभी तक स्पष्ट जानकारी किसी ने नहीं दी हैं कि इस स्थान पर कैसे और किसने मंदिर का निर्माण कराया है, लेकिन यह क्षेत्र के अति प्राचीन मंदिरों में गिना जाता हैं। स्थानीय नागरिक भी इस धार्मिक स्थल पर गहरी आस्था रखतें हैं। वैसे तो भक्तों का वर्ष भर यहां आना जाना लगा रहता है, लेकिन चैत्र नवरात्र के प्रथम दिवस, पंचमी और अष्टमी, नवमी को अधिक भीड़ रहती हैं। अष्टमी के मौके पर मां भगवती की पूजा पाठ और भोग लगाने लोगों का तांता लगा रहेता है वहीं नवमी के दिन ज्वारा विसर्जन के दौरान दूर दराज से भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
केला (केरा) के पेड़ होने से नाम पड़ा केरानारः स्थानीय लोगों का कहना हैं कि जिस स्थान पर मंदिर है, वहां पहले केला के पेड बहुतायत मात्रा में थे। अभी भी मंदिर परिसर के आसपास दर्जनों केले के पेड़ लगें हैं। क्षेत्रीय भाषा में केला को अपभ्रंश के रूप में अस्पष्ट केरा बोला जाता हैं। स्थानीय लोगों के केला को केरा नाम का संबोधन देने से कालांतर में इस स्थान का नाम केरानार बोला जाने लगा। तब से लोग इस स्थान को केरानार के नाम से जानते हैं। वैसे तो इस स्थान पर आदिवासी समाज की गहरी आस्था हैं, लेकिन भक्तों का भी अटूट विश्वास हैं। स्थानीय ग्रामीण ने बताया कि यहां की महिमा अपरंपार हैं। जब भी कोई समस्सा विचलित करती हैं वे तो माता के शरण में आ जाते हैं और यहां बैठने से अशांत मन भी शांत हो जाता हैं। निवारण के लिए अन्य समाज के लोगों
कुंड के पानी से होता है लाभः माता के भक्तों ने बताया कि मंदिर परिसर के समीप एक प्राकृतिक पानी का कुंड हैं, जिसमें हर समय अविरल धारा बहती रहती हैं। इस कुंड का पानी केंभी सूखते नहीं देखा गया हैं और इसके स्त्रोत के बारे में भी किसी प्रकार की जानकारी नहीं हैं। लोग कहते जहर है कि पहाड़ के अंदर से नीचे नीचे पानी आता हैं, लेकिन उस स्थान को आज तक किसी ने नहीं देखा, जबकि हर समय इसकी अविरल धारा बहती रहाती हैं। इस कुंड के पानी के बारे में मान्यता है कि इसके पानी में स्नान करने से लोगों को खुजली और चर्मरोग सहित अन्य बीमारियों से मुक्ति मिलती हैं।
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