बहुत तेज दिमाग लगाया है दूध माफिया ने, सही मायने में तो 75 रुपये लीटर ही बिक रहा है दूध
बेबस प्रशासन और जनप्रतिनिधि

जबलपुर यश भारत। दूध माफिया के द्वारा दामों में की गई अप्रत्याशित बढ़ोतरी को 10 दिन बीत चुके हैं लेकिन अब तक ना तो प्रशासन की ओर से दामों पर अंकुश लगाने कोई ठोस कदम उठाए गए हैं और ना ही जनहित की बात करने वाले सत्ता और विपक्ष के जनप्रतिनिधि भी इस मुद्दे पर अपना मुंह खोल रहे हैं जिसके कारण आम जनता तो परेशान है ही साथ ही प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की उदासीनता से दूध माफिया के हौसले बुलंद हैं। कहने को तो दूध के दाम ₹70 से बढाकर 73 रुपए किए गए हैं लेकिन जमीनी हकीकत ठीक इसके विपरीत है यदि गंभीरता से देखा जाए तो दूध 75 रुपए लीटर ही बेचा जा रहा है। और डेयरी संचालकों ने काफी तेज दिमाग लगाया है। आप बात करें जमीनी हकीकत की तो दूध के भाव 73 रुपए तो बताए जा रहे हैं लेकिन डेयरी वालों को यह मालूम है कि शहर में एक और ₹2 के सिक्कों का चालान लगभग पूरी तरह से बंद है ऐसे में यदि कोई दूध लेने डेरी में जाता है तो डेरी वाला उससे साफ शब्दों में कह देता है कि या तो आप दूध 75 रुपए का लो या फिर ₹80 का हमारे पास ₹2 चिल्लर नहीं है। वही आधा लीटर दूध लेने पर ज्यादातर डेयरी वाले ₹40 वसूल रहे हैं। इस हिसाब से तो दूध ₹80 लीटर तक पड़ रहा है। अब आम आदमी की परेशानी है यह है कि या तो वह दो या एक रुपए के का सिक्का अपने पास रखें लेकिन उसमें भी एक समस्या है एक तो एक और दो रुपए के सिक्के मिल ही नहीं रहे और यदि किसी के पास रख भी है तो खुद डेरी वाले इन्हें लेने से इनकार कर देते हैं और खुला जवाब देते हैं कि यह तो चल ही नहीं रहे ऐसी में आम आदमी के पास कोई विकल्प नहीं बचता या तो वह 75 रुपए का दूध ले या फिर ₹80 का चाहे जरूरत हो या ना हो। और यह पूरा खेल दूध माफिया की सुनियोजित रणनीति का हिस्सा है क्योंकि उन्हें अच्छी तरह से मालूम है कि ना तो एक ₹2 के सिक्के मिलेंगे और ना ही हमें लेंगे ऐसे में 73 का हिसाब कब 75 में परिवर्तित हो गया यह किसी की समझ में ही नहीं आया।
जनता की नजर में लाचार और विवस नजर आ रहे प्रशासन और जनप्रतिनिधि
एक तरफ बरसात और त्योहार के मौके पर दूध वालों ने दाम बढ़ाकर अच्छी खासी कमाई कर ली तो वहीं दूसरी तरफ जनता यह सोच-सोच कर परेशान है कि आखिर प्रशासन और जनप्रतिनिधि इतने इतने लाचार और बेबस कैसे नजर आ रहे हैं क्या डेयरी संचालकों की मनमानी पर अंकुश लगा पाने की इच्छा शक्ति और आत्मविश्वास उनमें नहीं रह गया क्या डेरी वाले प्रशासन और जनपद निधियां से भी ज्यादा वजनदार हैं। अनेक जन संगठनों के द्वारा लगातार दूध के दामों में बढ़ोतरी को लेकर न केवल प्रशासन से मांग की जा रही है बल्कि जनता से जुड़ा यह मुद्दा मीडिया की सुर्खियों में भी बना है लेकिन इन सब का असर किसी पर दिखाई नहीं दे रहा जो अपने आप में आश्चर्य पैदा करने वाला है।








