हाईकोर्ट ने किया एमसीआई का आदेश निरस्त
15 साल पुराने ममले में डॉक्टर हर्ष सक्सेना को मिली जीत

जबलपुर, यश भारत। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर पीठ ने डॉ. हर्ष सक्सेना और डॉ. आलोक अग्रवाल सहित अन्य चिकित्सकों को बड़ी राहत देते हुए मेडिकल काउंसिल ऑफइंडिया (एमसीआई) द्वारा जारी निलंबन आदेश को निरस्त कर दिया है। न्यायमूर्ति दीपक खोत की एकलपीठ ने स्पष्ट किया कि बिना ठोस साक्ष्य के केवल अनुमान के आधार पर की गई कार्रवाई कानून की कसौटी पर टिक नहीं सकती।
मामला वर्ष 2012 में डॉक्टरों के एक लंदन दौरे से जुड़ा है। आरोप लगाया गया था कि इस यात्रा का खर्च फर्मा कंपनी द्वारा उठाया गया, जो मेडिकल एथिक्स नियमों का उल्लंघन है। इस आधार पर एमसीआई की एथिक्स कमेटी ने 18 फरवरी 2015 को आदेश जारी कर संबंधित डॉक्टरों का नाम राज्य मेडिकल रजिस्टर से छह
महीने के लिए निलंबित कर दिया था, लेकिन इस आदेश को लेकर कोर्ट द्वारा तटकाल स्टे दे दिया गया था। डॉक्टर सक्सेना ने हाईकोर्ट में बैंक दस्तावेज, भुगतान रसीदें एवं अन्य प्रमाण प्रस्तुत करते हुए बताया कि यात्रा का पूरा खर्च उन्होंने स्वयं वहन किया था। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस प्रमाण नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि फर्मा कंपनी ने यात्रा प्रायोजित की या भुगतान की गई राशि डॉक्टरों को वापस की गई। कोर्ट ने यह भी माना कि एमसीआई का निर्णय केवल संभावना और अनुमान पर आधारित था, जो न्यायिक दृष्टि से स्वीकार्य नहीं है। न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि किसी भी अर्ध-न्यायिक संस्था के आदेश में स्पष्ट और ठोस कारण होना आवश्यक है। एमसीआई के आदेश में कारणों का अभाव पाया गया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है। इसी आधार पर हाईकोर्ट
फार्मा कंपिनयों से लाभ लेने का आरोप निकला निराधार
क्या कहा कोर्ट ने
ठोस साक्ष्य के अभाव में दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती
निर्णय में कारणों का होना अनिवार्य है’
अनुमान आधारित आदेश कानूनन टिकाऊ नहीं
यह फैसला मेडिकल पेशे से जुड़े मामलों में पारदर्शिता और न्यायिक प्रक्रिया की महत्ता को रेखांकित करता है।
ने उक्त आदेश को अवैध मानते हुए निरस्त कर दिया और दोनों याचिकाएं स्वीकार कर लीं।
ये हैं मुख्य बिंदु
हाईकोर्ट ने एमसीआई का 18 फरवरी 2015 का आदेश रद्द किया, डॉ. सक्सेना सहित अन्य को राहत।
6 माह के निलंबन को कोर्ट ने बताया अवैधफर्मा कंपनी द्वारा यात्रा प्रायोजन का आरोप सिद्ध नहीं डॉक्टरों ने स्वयं किया था यात्रा खर्च का भुगतान एमसीआई का निर्णय ‘अनुमान और अटकलों’ पर आधारित पाया गया कोर्ट ने कहा-बिना साक्ष्य दंडात्मक कार्रवाई स्वीकार्य नहीं प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन पर भी उठाए सवाल







