जबलपुरमध्य प्रदेश

चैत्र नवरात्र के तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की आराधना,मंदिरों में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़

मंदिरों के साथ ही घरों में भी पूजन का क्रम निरंतर जारी

जबलपुर,यशभारत। चैत्र नवरात्रि के तीसरे दिन शहरभर में भक्तिमय वातावरण देखने को मिला। हर ओर माता के भजनों की गूंज सुनाई दी—कहीं “चलो बुलावा आया है…” तो कहीं “शेर पे सवार होके आजा शेरा वालिए…” जैसे भजनों से पूरा शहर गुंजायमान रहा। संस्कारधानी पूरी तरह माता की भक्ति में डूबी नजर आई। सुबह से ही श्रद्धालु मंदिरों में जल अर्पित करने पहुंचे, जहां लंबी-लंबी कतारें लगी रहीं। भक्तों ने श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ मां की पूजा-अर्चना की। मंदिरों के साथ ही घरों में भी पूजन का क्रम निरंतर जारी रहा। नवरात्र के तीसरे दिन मां के चंद्रघंटा स्वरूप की विधिवत पूजा की गई।

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शहर के प्रमुख देवी मंदिरों—बड़ी खेरमाई मंदिर भानतलैया, बूढ़ी खेरमाई मंदिर चारखंभा, काली मंदिर सदर, बगलामुखी सिद्धपीठ सिविक सेंटर, छोटी खेरमाई देवन दीक्षितपुरा, खेरमाई मंदिर मानस भवन, शारदा मंदिर मदन महल और महाकाली मंदिर शोभापुर सहित अन्य स्थानों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचे।

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त्रिपुर सुंदरी मंदिर में उमडी भक्तों की भीड़

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इसी क्रम में शहर से लगभग 10 किलोमीटर दूर त्रिपुर सुंदरी मंदिर में भी विशेष श्रद्धा का माहौल रहा। यहां मां दुर्गा की तीन मुख वाली प्राचीन प्रतिमा विराजित है। यह मंदिर कलचुरी कालीन माना जाता है, जब त्रिपुरी (वर्तमान तेवर) कलचुरी राजाओं की राजधानी हुआ करती थी। तब से यहां निरंतर पूजा-अर्चना की परंपरा चली आ रही है।

नवरात्र पर्व के दौरान तेवर स्थित मंदिर में विशेष मेला लगता है, जिसमें शहर ही नहीं बल्कि आसपास के क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। मान्यता है कि यह मंदिर 7वीं शताब्दी का है और राजा कर्ण देव की कुलदेवी मां त्रिपुर सुंदरी थीं। पौराणिक कथा के अनुसार, राजा कर्ण की भक्ति से प्रसन्न होकर मां उन्हें उनके वजन के बराबर सोना प्रदान करती थीं। आज भी मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्रों में प्राचीन अवशेष मिलते रहते हैं, जिनका अध्ययन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा किया जा रहा है। धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक महत्व के कारण यह स्थल श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

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