जबलपुरमध्य प्रदेशराज्य

बचपन में चश्मे की गिरफ्त : मोबाइल संस्कृति और घटती आउटडोर एक्टिविटीज बनी मुख्य वजह : डॉ. अखिलेश नेमा

प्राइम टाइम विथ आशीष शुक्ला: नेत्र चिकित्सक डॉ. अखिलेश नेमा से खास चर्चा

जबलपुर, यश भारत । यश भारत के विशेष कार्यक्रम ‘प्राइम टाइम विथ आशीष शुक्ला के अंतर्गत इस बार महाकौशल और जबलपुर के जाने-माने नेत्र चिकित्सक डॉ. अखिलेश नेमा से खास मुलाकात हुई। हाल ही में राइट टाउन में आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित ‘छवि नेत्रालय अस्पताल के रूप में उन्होंने नेत्र चिकित्सा के क्षेत्र में एक नया मील का पत्थर स्थापित किया है। इस विशेष चर्चा में उन्होंने बच्चों में बढ़ते मायोपिया (कम दृष्टि दोष) और डायबिटीज का आँखों पर पडऩे वाले दुष्प्रभावों जैसे गंभीर विषयों पर विस्तार से प्रकाश डाला।
बच्चों में कम उम्र में चश्मे की समस्या और मायोपिया का बढ़ता दायरा

आज के समय में केजी-1 और पहली कक्षा के बच्चों को भी चश्मा लगना एक आम बात बन गई है। इस पर डॉ. अखिलेश नेमा ने बताया कि यह मुख्य रूप से हमारे बदलते लाइफस्टाइल और पर्यावरण का परिणाम है। बच्चे अब बाहर खेलने के बजाय घर की चारदीवारी में कैद होकर मोबाइल और कंप्यूटर स्क्रीन पर अधिक समय बिता रहे हैं। नजदीक की चीजों पर लगातार फोकस करने से आँखों की लंबाई बढ़ जाती है, जिससे माइनस नंबर का चश्मा लगने लगता है। इसके बचाव के लिए बच्चों को रोजाना 1 से 2 घंटे आउटडोर एक्टिविटीज और धूप में समय बिताना चाहिए।

स्क्रीन टाइम के नियम, और आँखों की सुरक्षा

बिना कंप्यूटर और स्क्रीन के आज का व्यावसायिक युग चलाना असंभव है, लेकिन इसके लिए सही नियम अपनाने बेहद जरूरी हैं। डॉ. नेमा ने ’20-20-20 नियम का सुझाव दिया है—हर 20 मिनट के बाद 20 सेकंड का ब्रेक लें और 20 फीट दूर किसी वस्तु या खिड़की से बाहर देखें। इसके अलावा, बच्चों की आँखों की नियमित जाँच बहुत जरूरी है ताकि समय रहते मायोपिया प्रोग्रेस को रोका जा सके। आधुनिक चिकित्सा में अब मायोपिया कंट्रोल ग्लासेस और विशेष आई ड्रॉप्स भी उपलब्ध हैं, जिन्हें डॉक्टर की सलाह से उपयोग में लाया जा सकता है।

डायबिटीज और आँखों का, स्वास्थ्य: एक गंभीर खतरा

कैटरेक्ट और ग्लूकोमा के बाद अब डायबिटीज अंधता का एक बहुत बड़ा कारण बनती जा रही है, और यह समस्या कम उम्र के लोगों में भी तेजी से पैर पसार रही है। डायबिटीज के कारण आँखों के परदे (रेटिना) की माइक्रोवेसल्स ब्लॉक होने लगती हैं, जिससे ऑक्सीजन की सप्लाई बाधित होती है और नई कमजोर रक्त वाहिकाएं बनने लगती हैं। इससे आँखों में खून आने जैसी गंभीर परेशानियां उत्पन्न हो जाती हैं। इससे बचने के लिए शुगर लेवल को नियंत्रित रखना, योग, प्राणायाम, नियमित सैर और डॉक्टर के मार्गदर्शन में सही डाइट चार्ट का पालन करना अनिवार्य है।

प्रीमेच्योर बच्चों में रेटिनोपैथी और आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं

जन्म से समय से पहले (प्रीमेच्योर) होने वाले बच्चों में ऑक्सीजन के अत्यधिक उपयोग के कारण ‘रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमेच्योरिटी  का खतरा रहता है, जिससे बच्चों का रेटिना प्रभावित हो सकता है। डॉ. नेमा ने बताया कि सही समय पर पीडियाट्रिशियन की सलाह से स्क्रीनिंग करवाकर लेजर या इंजेक्शन के माध्यम से इसका सफल इलाज संभव है। उन्होंने यह भी आश्वस्त किया कि बच्चों के नेत्र रोगों से जुड़ी ऐसी तमाम अत्याधुनिक और विश्वस्तरीय सुविधाएं अब जबलपुर के ‘छवि नेत्रालय में पूरी तरह उपलब्ध हैं।
इस संपूर्ण इंटरव्यू को आप ‘यश भारत न्यूज़ चैनल के साथ-साथ यश भारत के सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉम्र्स पर भी विस्तार से देख सकते हैं।

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