
जन्म प्रमाण-पत्र रद्द करने का आदेश हाईकोर्ट ने किया निरस्त, सांसद विवेक तन्खा की पैरवी पर हाईकोर्ट का अहम आदेश
इंदौर, यश भारत। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने जन्मतिथि से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में महेश्वर नगर परिषद के मुख्य नगर पालिका अधिकारी द्वारा 31 मार्च 2026 को जारी आदेश को निरस्त कर दिया है। मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक कृष्ण तन्खा ने पैरवी की। न्यायमूर्ति गजेंद्र सिंह की पीठ ने माना कि जन्मतिथि में बदलाव से सीधे प्रभावित होने वाली युवती, जिसे कोर्ट के आदेश में ‘M’ के रूप में संबोधित किया गया है, को अपना पक्ष रखने का प्रभावी अवसर दिया जाना जरूरी था।
2008 से 2009 की गई थी जन्मतिथि
मामला ‘M’ के जन्म प्रमाण-पत्र से जुड़ा है। रिकॉर्ड में उसकी जन्मतिथि पहले 1 जनवरी 2008 दर्ज थी। बाद में इसे बदलकर 30 दिसंबर 2009 कर दिया गया। याचिका में इस बदलाव को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से कोर्ट में बताया गया कि आधार कार्ड, पैन कार्ड और मतदाता पहचान पत्र समेत कई दस्तावेजों में पहले 1 जनवरी 2008 की जन्मतिथि दर्ज थी।
उम्र को लेकर विवाद पर अभी अंतिम फैसला नहीं
इस मामले में यह स्पष्ट करना जरूरी है कि हाईकोर्ट के मौजूदा आदेश में ‘M’ की उम्र को लेकर यह तय नहीं किया गया है कि वह बालिग है या नाबालिग। अदालत ने यह भी तय नहीं किया कि 1 जनवरी 2008 या 30 दिसंबर 2009 में से कौन-सी जन्मतिथि सही है। कोर्ट का फैसला मुख्य रूप से इस बात पर है कि जन्म रिकॉर्ड में बदलाव करने से पहले सीधे प्रभावित युवती को सुनवाई का उचित अवसर दिया जाना चाहिए था। इसी कारण हाईकोर्ट के आदेश में युवती को ‘M’ के रूप में संबोधित किया गया है और इस खबर में भी उसका नाम इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है। उम्र से जुड़ा विवाद अभी न्यायिक प्रक्रिया का विषय है।
फिर से सुनवाई के बाद होगा निर्णय
हाईकोर्ट ने कहा कि केवल युवती के पिता को सूचना देना पर्याप्त नहीं था। जन्मतिथि में बदलाव का सीधा प्रभाव युवती पर पड़ता है, इसलिए उसे भी अपना पक्ष रखने का प्रभावी अवसर दिया जाना आवश्यक था।
कोर्ट ने महेश्वर नगर परिषद के 31 मार्च 2026 के आदेश को निरस्त करते हुए संबंधित अधिकारी को निर्देश दिया कि पिता द्वारा जन्मतिथि में सुधार के लिए दिए गए आवेदन पर युवती को प्रभावी सुनवाई का अवसर दिया जाए और इसके बाद कानून के अनुसार नया निर्णय लिया जाए। इस तरह मौजूदा आदेश जन्मतिथि विवाद का अंतिम समाधान नहीं करता, बल्कि मामले को उचित सुनवाई के बाद नए सिरे से तय करने का रास्ता खोलता है।







