यशभारत संपादकीय : राहुल के आने से पहले ही क्यों गूंजने लगा सियासी डर?

– आशीष सोनी
राहुल गांधी के मध्यप्रदेश दौरे ने उनके इंदौर पहुंचने से पहले ही प्रदेश की राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। इंदौर में प्रस्तावित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम को लेकर जिस तरह आयोजन स्थल का विवाद खड़ा हुआ और कार्यक्रम की तारीख आगे बढ़ानी पड़ी, उसने कई राजनीतिक सवाल खड़े कर दिए हैं। कांग्रेस का दावा है कि राहुल गांधी छात्रों से शिक्षा, रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं, पेपर लीक और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दों पर संवाद करने आ रहे हैं। पार्टी का लक्ष्य हजारों छात्रों को इस संवाद से जोड़ना है। दूसरी तरफ भाजपा और प्रशासन का तर्क है कि नेहरू स्टेडियम राजनीतिक कार्यक्रमों के लिए उपलब्ध नहीं कराया जा सकता और इसके पीछे न्यायालयीन निर्देश तथा निर्धारित नियम हैं। लेकिन असली सवाल इससे कहीं बड़ा है—क्या लोकतंत्र में किसी विपक्षी नेता के कार्यक्रम को लेकर इतनी बेचैनी होनी चाहिए? अगर प्रशासन के पास नियम हैं तो उन्हें समान रूप से लागू किया जाना चाहिए। कल भाजपा का कोई नेता हो, कांग्रेस का हो या कोई अन्य राजनीतिक दल—नियम वही होने चाहिए। समस्या तब पैदा होती है जब प्रशासनिक फैसले राजनीतिक चश्मे से देखे जाने लगें। राहुल गांधी का मध्यप्रदेश दौरा केवल एक राजनीतिक यात्रा नहीं है। उन्होंने जिस तरह छात्रों और युवाओं के मुद्दों को अपने राजनीतिक संवाद का हिस्सा बनाया है, उससे भाजपा के सामने एक नई चुनौती जरूर खड़ी हुई है। युवा मतदाता को केवल भीड़ समझने की भूल अब किसी भी राजनीतिक दल के लिए महंगी पड़ सकती है। इंदौर में कार्यक्रम को स्थान न मिलना और उसके बाद कांग्रेस द्वारा वैकल्पिक मैदानों की मांग किया जाना इस विवाद को और राजनीतिक बना रहा है। कांग्रेस जहां इसे भाजपा सरकार की घबराहट बता रही है, वहीं भाजपा इसे नियमों और प्रशासनिक प्रक्रिया का मामला बता रही है। इसी बीच राज्य निर्वाचन आयोग ने कल अचानक फैसला लेते हुए प्रदेश भर में नगरीय निकायों और पंचायतों के उपचुनाव टाल दिए हैं। आयोग का कहना है कि इनकी तारीखें बाद में घोषित की जाएंगी। स्वाभाविक है किसी भी चुनाव की तैयारियों के लिहाज से आयोग का अपना नजरिया हो सकता है, लेकिन राजनीतिक हल्कों में चर्चा है कि प्रदेश सरकार राहुल गांधी के एमपी में जेन जी से संवाद के असर की थाह लिए बिना किसी भी तरह के चुनाव में नहीं जाना चाहती। यह भी खबर है कि इंदौर नगर निगम के वार्ड 58 और 60 के उपचुनाव मतदाता सूची में गड़बड़ी की शिकायतों के कारण स्थगित किए गए हैं।राजनीति में घटनाओं का समय भी संदेश देता है और यही समय विपक्ष को सवाल उठाने का अवसर दे रहा है। सवाल यह नहीं कि राहुल गांधी के दौरे से भाजपा को नुकसान होगा या कांग्रेस को फायदा। सवाल यह है कि क्या सरकार विपक्ष की राजनीतिक गतिविधियों को सहजता से स्वीकार करने का लोकतांत्रिक साहस दिखा रही है? यदि भाजपा मजबूत है, लोकप्रिय है और उसे अपने जनाधार पर भरोसा है तो राहुल गांधी को बोलने दीजिए। छात्रों को सुनने दीजिए। जनता को तय करने दीजिए कि किसकी बात में दम है। क्योंकि विपक्ष की आवाज को रोकने से आवाज खत्म नहीं होती, बल्कि कई बार वह और तेज हो जाती है। राहुल गांधी के इंदौर पहुंचने से पहले ही अगर ‘छात्रों की गूंज’ की चर्चा पूरे प्रदेश में होने लगी है, तो राजनीतिक रूप से यह कांग्रेस के लिए नुकसान से ज्यादा फायदा भी साबित हो सकता है। अब देखना यह है कि 19 सितंबर को जब राहुल गांधी इंदौर में छात्रों के बीच पहुंचेंगे, तब गूंज केवल मंच से उठेगी या मध्यप्रदेश की राजनीति में भी उसकी प्रतिध्वनि सुनाई देगी।







