सडक़ें बनीं मौत का जाल, हर दिन हो रहे हादसे, आवारा पशु कर रहे यातायात बाधित, कलेक्टर के आदेश की अवहेलना, चकाचौंध हेड लाइट और बेलगाम रफ्तार ले रही मूक पशुओं की जान

कटनी, यशभारत। कटनी-दमोह मार्ग सहित देश के अनेक प्रमुख एवं ग्रामीण संपर्क मार्ग इन दिनों दुर्घटनाओं के हॉटस्पॉट बनते जा रहे हैं। लगभग हर दिन किसी न किसी सडक़ हादसे की खबर सामने आ रही है। सबसे अधिक चिंता का विषय यह है कि इन हादसों के पीछे बार-बार वही तीन कारण सामने आ रहे हैं। सडक़ों पर आवारा मवेशियों का जमावड़ा, वाहनों में लगी अत्यधिक तेज सफेद दूधिया एलईडी हेड लाइटें और तेज रफ्तार से दौड़ते वाहन। रात्रि के समय स्थिति और भी भयावह हो जाती है। सामने से आने वाले वाहनों की आंखों में चुभने वाली सफेद हेड लाइटें चालक की आंखों को कुछ क्षणों के लिए पूरी तरह प्रभावित कर देती हैं। ऐसे में सडक़ पर बैठे मवेशी, पैदल राहगीर, साइकिल सवार या अन्य वाहन समय रहते दिखाई नहीं देते और देखते ही देखते एक दर्दनाक हादसा हो जाता है।
कटनी से निकलने वाले ग्रामीण क्षेत्रों में मुख्य मार्गों पर रात भर बैठे आवारा पशु दुर्घटनाओं का बड़ा कारण बन चुके हैं। कई परिवार अपने प्रियजनों को खो चुके हैं। अनेक लोग स्थायी रूप से दिव्यांग हो गए हैं। फिर भी समस्या का स्थायी समाधान आज तक नहीं हो सका है। यह केवल यातायात की समस्या नहीं, बल्कि जन जीवन और मानव सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय है। विशेषज्ञों का भी मानना है कि अत्यधिक तीखी तेज सफेद एलईडी हेड लाइटें सामने से आने वाले वाहन चालकों की आंखों में चकाचौंध पैदा करती हैं, जिससे कुछ सेकंड के लिए दृश्यता कम हो जाती है। यही कुछ सेकेंड कई बार जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर बन जाते हैं। ऐसे में मानकों से अधिक तेज रोशनी वाली हेड लाइटों पर नियंत्रण और प्रभावी कार्यवाही समय की मांग है।
सडक़ों से हटाने चले अभियान
जनहित में अब आवश्यक है कि प्रशासन और सरकार संयुक्त रूप से त्वरित एवं ठोस कदम उठाएं। सडक़ों से आवारा मवेशियों को हटाने के लिए विशेष अभियान चलाया जाए। मानकों के विरुद्ध लगी तेज़ सफेद हेड लाइटों पर प्रतिबंध एवं नियमित जांच की जाएए रात्रि कालीन यातायात निगरानी बढ़ाई जाए तथा अधिक तेज़ रफ़्तार वाहनों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही सुनिश्चित की जाए। हर दुर्घटना केवल एक आंकड़ा नहीं होतीए बल्कि किसी परिवार का उजड़ता हुआ संसार होती है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो सडक़ों पर बहता खून और बिखरते परिवार व्यवस्था की संवेदनहीनता पर सबसे बड़ा सवाल बनेगा। अब जरूरत केवल आश्वासनों की नहीं, बल्कि जीवन बचाने वाले ठोस और त्वरित निर्णयों की है।







