रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के कोर्ट बैठक के दौरान जमकर हंगामा, विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सत्तापक्ष और विपक्ष के विधायकों ने जताया गहरा असंतोष। विश्वविद्यालय का वार्षिक बजट नहीं हो सका पास।

जबलपुर। रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय की कोर्ट की वार्षिक बैठक गुरुवार को जबरदस्त हंगामे के बीच विवादों में घिर गई। विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के जनप्रतिनिधियों ने खुलकर नाराज़गी जताई और बैठक के दौरान तीखे आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला। स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई कि शहपुरा विधायक ओम प्रकाश धुर्वे ने बैठक के बीच ही कुलगुरु सहित वरिष्ठ अधिकारियों से इस्तीफे की मांग कर दी। वहीं जबलपुर पूर्व से विधायक लखन घनघोरिया ने भी विश्वविद्यालय प्रशासन पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए व्यवस्थाओं को लेकर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। हंगामे के बीच अंततः विश्वविद्यालय का वार्षिक बजट पारित नहीं हो सका और कोर्ट के सदस्यों ने इसे अस्वीकार कर दिया।
बैठक के दौरान जनप्रतिनिधियों ने विश्वविद्यालय की वर्तमान स्थिति पर गहरा असंतोष व्यक्त करते हुए कहा कि संस्थान की शैक्षणिक गरिमा लगातार प्रभावित हो रही है और प्रशासनिक स्तर पर गंभीर लापरवाही दिखाई दे रही है। शहपुरा विधायक ओम प्रकाश धुर्वे ने विश्वविद्यालय प्रशासन को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि यदि अधिकारी विश्वविद्यालय के दीर्घकालिक हितों के प्रति गंभीर नहीं हैं, तो उन्हें अपने पदों पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने पिछले कुछ वर्षों में विश्वविद्यालय में सामने आई विभिन्न अनियमितताओं और छात्र हितों से जुड़े मुद्दों पर प्रशासन से तीखे सवाल पूछे और जवाबदेही तय करने की मांग की।
वहीं जबलपुर पूर्व से कांग्रेस विधायक लखन घनघोरिया ने भी विश्वविद्यालय की बदहाल शैक्षणिक व्यवस्था पर चिंता जताते हुए कई गंभीर मुद्दे उठाए। उन्होंने कृषि विभाग की खराब स्थिति, बिना पर्याप्त संसाधनों के संचालित बीसीए और एमसीए जैसे तकनीकी पाठ्यक्रमों तथा छात्रों को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध न कराए जाने पर कड़ा विरोध दर्ज कराया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने विधानसभा में विश्वविद्यालय से जुड़े मामलों को लेकर भ्रामक और असत्य जानकारी प्रस्तुत की है, जो अत्यंत गंभीर विषय है।
बैठक में बढ़ते विरोध और तीखी बहस के कारण माहौल काफी गर्मा गया और हंगामे की स्थिति बन गई। इसी दौरान कोर्ट के सदस्यों और जनप्रतिनिधियों ने विश्वविद्यालय के वार्षिक बजट पर कड़ा विरोध जताते हुए इसे अनुमोदित करने से इनकार कर दिया। सदस्यों का कहना था कि जब तक प्रशासन अपनी कार्यप्रणाली में सुधार नहीं करता और वित्तीय प्रस्तावों को यथार्थपरक तरीके से पुनरीक्षित नहीं करता, तब तक बजट को मंजूरी नहीं दी जा सकती।
उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश विश्वविद्यालय अधिनियम 1973 की धारा 19(1) के अनुसार विश्वविद्यालय की सभा (कोर्ट) विश्वविद्यालय की प्रमुख प्राधिकारी संस्था होती है। वहीं अधिनियम की धारा 22 की उपधारा (3) और (4) के अंतर्गत विश्वविद्यालय के वार्षिक प्राक्कलन तथा वार्षिक वित्तीय रिपोर्ट को अनुमोदित करना कोर्ट का अधिकार और दायित्व है। गुरुवार को हुई बैठक में जनप्रतिनिधियों के तीखे विरोध के चलते बजट को अस्वीकार करते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन को निर्देश दिया गया कि वह आवश्यक संशोधन कर बजट को पुनः तैयार करे और आगामी बैठक में पुनः प्रस्तुत करे।
उल्लेखनीय है कि पिछले कुछ समय से रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय लगातार विभिन्न प्रशासनिक और शैक्षणिक अनियमितताओं को लेकर चर्चा में रहा है। छात्रों की छात्रवृत्ति वितरण में देरी, डिग्री एवं अंकसूची जारी करने में लंबा विलंब, परीक्षा परिणामों में त्रुटियाँ, समय पर परिणाम घोषित न होना, तथा परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर कई सवाल उठते रहे हैं। इसके अलावा तकनीकी पाठ्यक्रमों के संचालन में संसाधनों की कमी, विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों की अव्यवस्थित स्थिति तथा प्रशासनिक निर्णयों में कथित लापरवाही को लेकर भी छात्र संगठनों और जनप्रतिनिधियों द्वारा समय-समय पर विरोध दर्ज कराया जाता रहा है।
कोर्ट की बैठक में हुए इस तीखे टकराव ने विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। जनप्रतिनिधियों के खुले विरोध और बजट के अस्वीकार होने से यह स्पष्ट हो गया है कि विश्वविद्यालय की प्रशासनिक और शैक्षणिक व्यवस्थाओं को लेकर असंतोष अब सार्वजनिक रूप से सामने आने लगा है। इस घटनाक्रम के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन पर जवाबदेही और सुधार का दबाव और अधिक बढ़ गया है।







