Dial112 “उप कप्तान की कुर्सी खाली होने की आहट, दावेदारों की लगी कतार!”

“उप कप्तान की कुर्सी खाली होने की आहट, दावेदारों की लगी कतार!”

पुलिस विभाग में इन दिनों शहर के एक उप कप्तान के संभावित ट्रांसफर की चर्चा खूब गरमा रही है। कहा जा रहा है कि आने वाली सूची में उनका नाम भी हो सकता है। बस फिर क्या था—यह खबर फैलते ही विभाग में मानो कुर्सी की दौड़ शुरू हो गई।
आस-पास के जिलों से लेकर शहर तक कई अधिकारी धीरे-धीरे अपनी-अपनी गोटी फिट करने में जुट गए हैं। हर किसी की नजर इस कुर्सी पर है, मानो किस्मत ने साथ दिया तो लॉटरी यहीं खुल जाएगी।
विभाग के गलियारों में अब चटखारे लेकर चर्चा हो रही है कि देखना दिलचस्प होगा—किसकी किस्मत चमकती है और किसकी दाल नहीं गलती। कहीं ऐसा न हो कि आखिरी वक्त में कोई सीनियर अधिकारी बाजी मार ले जाए और बाकी दावेदार देखते ही रह जाएं। कुल मिलाकर हालात ऐसे हैं कि कुर्सी अभी खाली भी नहीं हुई और दावेदारों की कतार लग चुकी है—अब देखना है कि आखिर यह कुर्सी किसकी झोली में गिरती है।
थाने में ‘ट्रैफिक मोड’ में मैडम टीआई, जनता ढूंढे और फोन भी मौन

शहर के एक संवेदनशील थाने की कमान हाल ही में यातायात से आई मैडम टीआई के हाथों में है, लेकिन हालात कुछ ऐसे हैं कि “न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी” वाली कहावत याद आ जाती है। थाने में मैडम को ढूंढना किसी ऊंट के मुंह में जीरा जैसा हो गया है—कभी थाने में मिलती नहीं हैं, और फोन तो मानो सांप सूंघ गया हो।
थाने का समय बीतता रहता है, फरियादी दरवाजे खटखटाते रहते हैं, लेकिन मैडम की मौजूदगी अक्सर ढाक के तीन पात ही साबित होती है। हाल ही में क्राइम मीटिंग में एसपी साहब ने भी समय और जिम्मेदारी को लेकर साफ शब्दों में नसीहत दी थी, मगर लगता है कि वह बात भी एक कान से सुनी और दूसरे से निकाल दी वाली कहावत में कहीं गुम हो गई।
मजेदार बात यह है कि मैडम भले ही अब थाने में हों, पर उनकी कार्यशैली देखकर लगता है जैसे मन अभी भी ट्रैफिक के दर्रों में ही अटका हुआ है। जनता अपनी समस्याओं का समाधान ढूंढते-ढूंढते परेशान है, और थाना मानो राम भरोसे चल रहा है।
अब सवाल यही है कि शहर के इस संवेदनशील थाने की गाड़ी कब पटरी पर आएगी, या फिर जिम्मेदारी का यह ट्रैफिक जाम ऐसे ही कछुए की चाल से चलता रहेगा।
“जोड़ी नंबर वन की वापसी: फिर वही थाने की कहानी!”

शहर की मशहूर बजरिया वाले इलाके का चर्चित थाना कभी अपनी तगड़ी जोड़ी के लिए खूब सुर्खियों में रहा। फिटनेस के लिए नाम कमाने वाले थानेदार साहब और उनके खासमखास अधीनस्थ की जोड़ी ऐसी जमी कि विभाग में लंबे समय तक चर्चा का विषय बनी रही। कहते हैं कि दोनों ने मिलकर थाने की गाड़ी खूब फर्राटा दौड़ाई, मगर जब शिकायतों की हवा चली तो मामला ऐसा बिगड़ा कि रुटीन ट्रांसफर की आंधी में दोनों अलग-अलग दिशाओं में उड़ गए।इधर साहब लाइन में बैठे, उधर उनके खास एसआई भी चौकी प्रभारी बनकर पहुंचे, मगर वहाँ भी ढाक के तीन पात वाली कहानी दोहराई गई और अंततः लाइन हाजिर होना पड़ा।लेकिन कहते हैं न, जिसकी किस्मत बलवान, उसका कौन बिगाड़े मान! अचानक कृपा बरसी—टीआई साहब को एक ग्रामीण थाने की कमान मिल गई। उधर लाइन में बैठे उनके पुराने साथी एसआई ने भी अपने किसी गॉडफादर की छत्रछाया में वही थाना पकड़ लिया।अब विभाग में चटखारे लेकर चर्चा हो रही है कि पुरानी जोड़ी फिर एक ही थाने में आमने-सामने नहीं, बल्कि साथ-साथ खड़ी है। दो साल पहले जिस जोड़ी ने जमकर रौला काटा था, अब देखना यह है कि आगे यह जोड़ी कौन-कौन से नए गुल खिलाती है। आखिर कहते हैं—पुराने खिलाड़ी मैदान में लौट आएं, तो खेल और भी दिलचस्प हो जाता है!
“सैंया भये कोतवाल तो डर काहे का!”

यातायात विभाग की एक महिला अधिकारी इन दिनों अपने काम से ज्यादा छुट्टियों की रफ्तार को लेकर चर्चा में हैं। अधीनस्थों की मानें तो मैडम का दफ्तर में मिलना अब चांद के दीदार जैसा हो गया है—कभी-कभार ही नज़र आती हैं।
बताया जाता है कि कुछ समय पहले ऑनलाइन पैसे लेने को लेकर उन पर आरोपों की आहट भी उठी थी। उसके बाद से मानो मैडम का मन काम से कुछ उचट-सा गया है। दफ्तर में लोग चुटकी लेते हैं कि मैडम की ड्यूटी से ज्यादा छुट्टी की हाजिरी पक्की रहती है।दिलचस्प पहलू यह भी है कि मैडम के पति परमेश्वर भी पुलिस विभाग में बड़े पद पर विराजमान हैं। ऐसे में दफ्तर के गलियारों में फुसफुसाहट चल पड़ती है—“सैंया भये कोतवाल तो डर काहे का!”अब यह बात कितनी सच और कितनी चटपटी है, यह तो विभाग ही जाने, लेकिन कर्मचारियों के बीच यह तंज जरूर तैर रहा है कि जब सहारा मजबूत हो, तो तो फिर ड्यूटी की घड़ी भी छुट्टी जैसी ही लगती है







