जबलपुरमध्य प्रदेशराज्य

शुभ दिन आज लगे सावन के झूला झूले, नंदकिशोर और झूला झूल रहे नंदलाला, झुलाये लाई रही राधा रानी सिमटती परंपराएं अब पहले जैसी बात कहां

जबलपुर यश भारत। सावन का महीना भले ही भगवान भोलेनाथ को समर्पित और उनके प्रिय माह के रूप में जाना जाता हो। लेकिन सावन के महीने की दूसरी परंपराएं भी रही हैं जो समय के साथ-साथ अब सिमटती जा रही है। यदि डेढ दो दशक के पहले के ही सामाजिक परिवेश पर नजर डाली जाए तो सावन महीने की शुरुआत से ही शहर से लेकर ग्रामीण अंचलों तक न जाने कितने मेले लगते थे और इन मेलों का विशेष आकर्षण होता था उन में लगने वाले झूले। कृष्ण मंदिरों के अलावा लोग घरों में भी झूला डालते थे और झांकियां सजाते थे इतना ही नहीं ग्रामीण अंचलों के स्कूलों तक में झांकियां बनाई जाती थी। जिसमें धार्मिक भावना तो शामिल रहती ही थी लेकिन एक अलग उल्लास भी नजर आता था। गांव की गलियों से लेकर शहर के गली मोहल्ले तक में हारमोनियम ढोलक और मंजीरा की थाप के साथ महिलाओं की टोली कजरी गीत गाते नजर आ जाती थी। सावन की यह अनुभूति जो कुछ वर्षो पहले तक देखने को मिलती थी और मन को रोमांचित करने वाले परंपरागत कजरी गीत या फिर प्रकृति की सुंदरता को बयां करने वाले लोकगीत पूरी माहौल में एक अलग ही रंग घोल देते थे। लेकिन आधुनिकता के इस दौर में सब कुछ विलुप्त सा होता जा रहा है। इनमें हमारी सांस्कृतिक परंपराएं भी शामिल हैं। सावन की बात हो और झूलों का जिक्र ना हो ऐसा संभव नहीं है। ऐसा नहीं हैग यह परंपराएं पूरी तरह से समाप्त हो गई है लेकिन इनमें कमी जरूर आई है। ना तो अब पहले जैसे सावन के मेले भरते है और ना ही मेले में वह परंपरागत झूले नजर आते हैं लकड़ी के बने इन झूलों को हिंडोला भी कहा जाता था लेकिन अब यह गुजरे जमाने की बात हो गई अब इन झूलों की जगह ले ली है अत्यधिक बिजली से चलने वाले हाईटेक झूलों ने जो मडई मेले से लेकर दूसरे मौको पर लगने वाले मेलो और प्रदर्शनी में मिल जाएंगे।
मंदिरों तक सिमट गई झूला और झांकी की परंपरा यदि वर्तमान परिदृश्य की बात करें तो झूला और झांकियां की परंपरा गत अब कृष्ण मंदिरों तक सिमट कर रह गई है। इन मंदिरों में आज भी परंपरागत तरीके से न केवल झूले डाले जाते हैं बल्कि झांकियां भी सजाई जाती है। यदि शहर की बात करें तो जबलपुर में आज भी प्रमुख कृष्ण मंदिर सनातन धर्म मंदिर गोरखपुर गोपाल लाल जी का मंदिर हनुमानताल पचमठा मंदिर गढ़ा कृष्ण मंदिर सराफा के अलावा शहर एवं उपनगरीय क्षेत्र की मंदिरों में भी झूलो और झांकियां की परंपरा बखूबी निभाई जा रही है। इन मंदिरों में आज भी भजन के कार्यक्रम और दूसरी सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित होते हैं लेकिन पूर्व वर्षों की भांति वर्तमान में घरों में झूला डालने की परंपरा में काफी कमी आई है। शहर हो या ग्रामीण अंचल का गांव वहां यदि कृष्ण मंदिर है तो यह परंपरा दिख जाएगी लेकिन गांव में भी इक्का दुक्का घर में ही यह देखने को मिलता है। जो कहीं ना कहीं इस बात को स्पष्ट भी करता है कि व्यस्तता के इस माहौल में लोग परंपराओं से दूर होते जा रहे है।

सावन और झूलो का संगम और महत्व सावन के महीने में झूला झूलना एक पारंपरिक प्रथा है जो भगवान शिव और देवी पार्वती के प्रेम और प्रकृति के उत्सव से जुड़ी है। मान्यता है कि सावन में झूला झूलने से पति-पत्नी के बीच प्रेम बढ़ता है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।
सावन में झूला झूलने की परंपरा भगवान शिव और देवी पार्वती के प्रेम से जुड़ी है। कहा जाता है कि भगवान शिव ने सावन में देवी पार्वती के लिए झूला लगाया था और उन्हें झूला झुलाया था.
पति-पत्नी के बीच प्रेम
यह भी माना जाता है कि जो पति अपनी पत्नी को सावन में झूला झुलाते हैं, उनका वैवाहिक जीवन प्रेम से भर जाता है.
प्रकृति का उत्सव:
सावन में चारों ओर हरियाली होती है और वर्षा होती है, जो प्रकृति का उत्सव है। झूला झूलना प्रकृति के साथ जुड़ने और आनंद लेने का एक तरीका है.
पारिवारिक एकता:
सावन में झूला झूलने से परिवार के सदस्यों के बीच प्रेम और एकता बढ़ती है.
मानसिक शांति:
झूला झूलने से मन को शांति मिलती है और तनाव कम होता है.
झूला झूलने की परंपरा:
मंदिरों में:
सावन में मंदिरों में देवी-देवताओं के लिए झूले लगाए जाते हैं और उन्हें झुलाया जाता है.
घरों में:
कई घरों में भी सावन में झूले लगाए जाते हैं और महिलाएं झूला झूलती हैं.
गीत
झूला झूलते समय भगवान कृष्ण और राधा रानी को याद करते हुए गीत गाए जाते हैं.

सावन में झूला झूलना एक शुभ और आनंददायक परंपरा है जो धार्मिक, सामाजिक और प्राकृतिक महत्व रखती है। यह पति-पत्नी के बीच प्रेम, पारिवारिक एकता और प्रकृति के उत्सव का प्रतीक है

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