भोपाल में तस्करों का नया सेफ जोन बना आईएसबीटी: 18 दिन में 12.85 करोड़ का नशा बरामद, सुरक्षा के दावों की खुली पोल

भोपाल में तस्करों का नया सेफ जोन बना आईएसबीटी: 18 दिन में 12.85 करोड़ का नशा बरामद, सुरक्षा के दावों की खुली पोल
भोपाल, यशभारत। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में नशे का अवैध कारोबार अब किस हद तक खतरनाक रूप ले चुका है, इसकी बानगी शहर के सबसे बड़े अंतरराज्यीय बस टर्मिनस पर देखने को मिल रही है। राजस्व खुफिया निदेशालय द्वारा पिछले महज 18 दिनों के भीतर की गई तीन ताबड़तोड़ कार्रवाइयों ने यह साफ कर दिया है कि तस्करों के लिए भोपाल अब सिर्फ खपाने की जगह नहीं, बल्कि एक सुरक्षित ट्रांजिट कॉरिडोर बनता जा रहा है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस आईएसबीटी परिसर में पुलिस चौकी और नियमित गश्ती दल तैनात रहते हैं, वहां अपराधियों के हौसले इतने बुलंद कैसे हैं कि वे यात्री बसों के जरिए करोड़ों का जहर धड़ल्ले से शहर के भीतर उतार रहे हैं।
18 दिन, 3 बड़े खुलासे और 12.85 करोड़ का जहर
डीआरआई की ओर से अक्टूबर और नवंबर के शुरुआती दिनों में जो आंकड़े सामने आए हैं, वे सुरक्षा एजेंसियों और स्थानीय पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
14 अक्टूबर: पहली कार्रवाई में 2.604 किलो एम्फेटामाइन कीमत करीब 2.08 करोड़ रुपये जब्त की गई।
20 अक्टूबर: महज छह दिन बाद दूसरी बड़ी खेप में 9.139 किलो मेथामफेटामाइन कीमत करीब 7.32 करोड़ रुपये पकड़ी गई।
1 नवंबर : रविवार तड़के दिल्ली से भोपाल आ रही एक स्लीपर बस से दो यात्रियों के पास से 4.321 किलो हाई-ग्रेड मेथामफेटामाइन (कीमत करीब 3.45 करोड़ रुपये) बरामद की गई।
इन तीनों मामलों में कुल मिलाकर 13.46 किलो सिंथेटिक ड्रग्स पकड़ी जा चुकी है, जिसकी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत 12.85 करोड़ रुपये आंकी गई है।
बसों को बनाया जा रहा है तस्करी का जरिया
जांच में यह बात प्रमुखता से सामने आई है कि तस्कर अब पार्सल या महंगी गाड़ियों के बजाय अंतरराज्यीय बसों का सबसे ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं। दिल्ली और अन्य महानगरों से आने वाली इन स्लीपर बसों में यात्रियों के सामान के बीच मादक पदार्थों को छिपाकर राजधानी तक पहुंचाया जाता है। लंबी दूरी तय करने वाली इन बसों में स्थानीय स्तर पर रैंडम चेकिंग या बैगेज स्कैनिंग की कोई ठोस व्यवस्था न होना तस्करों के लिए सबसे बड़ा कवच साबित हो रहा है।
चौकी और पुलिसिंग के दावों की खुली पोल
आईएसबीटी जैसे व्यस्त और संवेदनशील परिसर में पुलिस चौकी होने, सुरक्षा गार्ड्स और पेट्रोलिंग के दावे किए जाते हैं। इसके बावजूद, स्थानीय पुलिस को इन बड़ी गतिविधियों की भनक तक नहीं लगी। तीनों बार धरपकड़ पूरी तरह से डीआरआई के गोपनीय इनपुट पर आधारित रही। यदि केंद्रीय एजेंसी के पुख्ता सूत्र सक्रिय न होते, तो करोड़ों की यह सिंथेटिक ड्रग्स आसानी से भोपाल के स्थानीय पैडलर्स तक पहुंच चुकी होती।
बढ़ता ड्रग्स का यह नेटवर्क अब सिर्फ अपराध का मामला नहीं, बल्कि शहर की युवा पीढ़ी के भविष्य के लिए एक गंभीर संकट बन चुका है। ऐसे में स्थानीय पुलिस और प्रशासन को अपनी इंटेलिजेंस विंग को मजबूत करने के साथ-साथ बस स्टैंड पर यात्रियों के सामान की सख्त जांच के लिए विशेष अभियान चलाने की सख्त जरूरत है, अन्यथा भोपाल देश के बड़े ड्रग सिंडिकेट्स का सेफ जोन बनकर रह जाएगा।







