यशभारत साक्षात्कार : पद का गौरव नहीं, उत्तरदायित्व का नाम है खाकी: रिटायर्ड ACP राजेश मेहता का जीवन, अनुभवों की पाठशाला

सागर । समाज में अमूमन जब भी पुलिस विभाग या किसी वर्दीधारी अधिकारी की बात होती है, तो मानस पटल पर कड़ाई, अनुशासन और एक सख्त प्रशासक की छवि उभरती है। परंतु, खाकी वर्दी के पीछे भी एक संवेदनशील इंसान, एक विचारक और समाज को गहराई से समझने वाला दार्शनिक छुपा होता है।
एक अत्यंत प्रभावशाली और विस्तृत साक्षात्कार में सेवानिवृत्त सहायक पुलिस आयुक्त (ACP) राजेश मेहता ने अपने जीवन के अनछुए पहलुओं को बेहद बेबाकी से साझा किया। यह संवाद केवल एक पुलिस अधिकारी की सेवा-यात्रा नहीं है, बल्कि यह हर वर्ग को एक शाश्वत संदेश देता है कि “यदि आप अपने कर्तव्य का पूरी निष्ठा से निर्वहन करते हैं, तो वही कर्तव्य अंततः आपकी और समाज की ढाल बन जाता है (धर्मो रक्षति रक्षिता)”।
जब यादों ने बुनी भविष्य की नींव
महाकौशल के गौरवशाली और जीवंत शहर कटनी में जन्मे राजेश मेहता की वैचारिक और बौद्धिक नींव को तराशने में हमारे अपने प्रतिष्ठित डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय (सागर विश्वविद्यालय) का सबसे बड़ा योगदान रहा है। उन्होंने यहाँ के विख्यात विभाग से ‘क्रिमिनोलॉजी एंड फॉरेंसिक साइंस’ (अपराध शास्त्र एवं न्यायालयीन विज्ञान) में उच्च शिक्षा प्राप्त की। विश्वविद्यालय के वे दिन उनके जीवन के सबसे खूबसूरत और खट्टे-मीठे अनुभवों से भरे थे। जहाँ एक ओर हॉस्टल की बेफिक्र मस्ती, दोस्तों के साथ चाय की थड़ियों पर होने वाली बौद्धिक बहसें और विवि परिसर की वादियों में ज्ञान अर्जित करने का मीठा अहसास था, वहीं दूसरी ओर एक मध्यमवर्गीय परिवार से आकर सीमित संसाधनों के बीच खुद को साबित करने की खट्टी-मीठी जद्दोजहद भी थी। यह वह दौर था जिसने एक आम युवा को मानसिक रूप से इतना परिपक्व और मजबूत बना दिया कि वे आगे चलकर जीवन के किसी भी झंझावात में अडिग रहे।
समाज का स्याह सच
सागर विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान मेहता जी का सामना केवल किताबी सिद्धांतों से नहीं हुआ, बल्कि व्यावहारिक शोध (डिजर्टेशन वर्क) के सिलसिले में जब वे सेंट्रल जेल की सलाखों के पीछे पहुंचे, तो उन्हें जीवन के बेहद कड़वे और स्याह सच का अहसास हुआ। जेल में बंद कैदियों की पृष्ठभूमि और उनकी मानसिक स्थिति का अध्ययन करते हुए मेहता जी ने जो देखा, उसने उनके भीतर के इंसान को झकझोर दिया। इस कड़वे अनुभव ने उन्हें सिखाया कि कानून की नजर में भले ही हर अपराध एक समान हो, लेकिन उसके पीछे की सामाजिक और मानवीय विवशताएं अलग होती हैं। उन्होंने न्याय प्रणाली और समाज को एक बड़ा संदेश देते हुए कहा—”अपराधियों की भी श्रेणियां होती हैं। एक वह बच्चा है जो भूख मिटाने के लिए मजबूरी में आकर ब्रेड का टुकड़ा चुरा लेता है, और दूसरी तरफ वे पेशेवर शातिर अपराधी हैं जो समाज को योजनाबद्ध तरीके से नुकसान पहुंचाते हैं। सहानुभूति कभी क्रूर अपराधियों के लिए नहीं होनी चाहिए, उनके लिए कानून लोहे जैसा सख्त हो; लेकिन व्यवस्था की मार झेल रहे लाचारों के प्रति पुलिस के दिल में इंसानियत की धड़कन होनी जरूरी है।”
युवाओं के लिए संघर्ष का मंत्र
विवि से शिक्षा पूरी करने के बाद का सफर भी किसी परीक्षा से कम नहीं था। मेहता जी ने अपने करियर की शुरुआत विद्युत मंडल में एक बेहद साधारण और छोटी सी नौकरी से की। लेकिन जिसके सीने में देश सेवा और खाकी का जज्बा हिलोरे ले रहा हो, उसे कोई छोटी परिधि बांधकर नहीं रख सकती। जल्द ही उनका चयन मध्य प्रदेश पुलिस में सब-इनस्पेक्टर के रूप में हुआ और वे अपनी ईमानदारी व कर्तव्यपरायणता के दम पर एसीपी (ACP) के शीर्ष पद से सेवानिवृत्त हुए। उनका यह जीवन-अनुभव आज के युवाओं को सबसे बड़ा संदेश देता है कि आपकी शुरुआत चाहे जितनी छोटी या विपरीत परिस्थितियों में क्यों न हो, यदि आपके भीतर दृढ़ संकल्प और ईमानदारी है, तो सफलता एक दिन आपके कदम चूमेगी। अतीत का यही खट्टा-मीठा संघर्ष भविष्य की सफलता में ‘गर्व और संतोष’ की वास्तविक चमक पैदा करता है।
उत्तरदायित्व का नाम है खाकी
शासकीय सेवा में आने वाले नए अधिकारियों को संदेश देते हुए मेहता जी ने एक बेहद मर्मस्पर्शी और व्यावहारिक उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि अगर 100 लोगों की भारी भीड़ में एक साधारण पुलिस कांस्टेबल भी अपनी यूनिफॉर्म में खड़ा हो जाए, तो वह पूरी भीड़ से अलग और विशिष्ट दिखता है। लेकिन इस विशिष्टता का मतलब ‘रसूख या वीआईपी’ होना नहीं, बल्कि समाज के प्रति ‘अतिरिक्त जिम्मेदार’ होना है। समाज उस खाकी को सुरक्षा, शांति और न्याय का अंतिम प्रतीक मानता है। इसलिए शासकीय सेवा का संदेश स्पष्ट है—”पद आपको समाज पर धौंस जमाने या अहंकार करने का अधिकार नहीं देता, बल्कि समाज के प्रति और अधिक झुककर, संवेदनशील होकर सेवा करने का उत्तरदायित्व सौंपता है।”
भीतर का मौन और युवाओं को गुरुमंत्र
कानून की सूखी धाराओं, मुकदमों की तफ्तीश और पुलिसिंग के कड़वे व तनावपूर्ण माहौल के बीच भी राजेश मेहता जी के भीतर की कलात्मक अभिरुचि और संवेदनशीलता कभी नहीं मरी। उनका मानना है कि जब मनुष्य अपने भीतर के मौन और रचनात्मकता से परिचित होता है, तभी वह अपने जीवन की असली और मुकम्मल कहानी लिख पाता है। साक्षात्कार के समापन पर उन्होंने आज की युवा पीढ़ी को सफलता की जो त्रिवेणी सौंपी, वह जीवन का मूलमंत्र है—”अपने काम के प्रति संपूर्ण समर्पण, ईमानदारी और जीवन में कड़ा अनुशासन (डिसिप्लिन) बनाए रखिए। अगर ये चीजें आपके पास हैं, तो आप उस मुकाम को भी हासिल कर लेंगे जिसकी कल्पना शायद आज आपने खुद भी नहीं की होगी।” खाकी से लेकर ख्वाबों के इस सफरनामे को समेटता यह आलेख साबित करता है कि कर्तव्य पथ पर चलते हुए भी इंसानियत और मूल्यों को कैसे जिंदा रखा जाता है।







