यशभारत संपादकीय…क्या सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था को फिर किसी कृष्ण की जरूरत है ?

– आशीष सोनी
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ……श्रीमद्भगवद्गीता के चतुर्थ अध्याय का यह सातवां श्लोक है, जिसमें श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जब-जब पृथ्वी पर धर्म का पतन और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब वे स्वयं अवतार लेते हैं। भारत की मौजूदा राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था के लिहाज से यह विषय चिंतन का हो सकता है कि कौन सी ऐसी शक्ति है जो मूल्यों के पतन और इंसानियत में गिरावट पर सेफ्टी वाल्व का काम कर सके। वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था पर जब धर्म एक कारक के बतौर इस्तमाल होने लगा है, तब इसे अधर्म की संज्ञा दे या आज के दौर में इसे ही धर्म माने, भारतीय समाज के सामने यह विडंबना है। सत्ता सेवा का माध्यम है या स्वार्थ का साधन? यह सवाल आज जितना प्रासंगिक है, शायद उतना कभी नहीं था।
श्रीकृष्ण को केवल बांसुरी बजाने वाले, प्रेम और भक्ति के प्रतीक के रूप में देखना उनके विराट व्यक्तित्व को सीमित कर देना है। कृष्ण जीवन के ऐसे दार्शनिक हैं जिन्होंने धर्म को केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे कर्तव्य, न्याय, नीति और लोककल्याण से जोड़ा। महाभारत के कठिनतम समय में उनका संदेश था कि जब व्यवस्था अन्याय के सामने खड़ी हो जाए, तब मौन रहना भी एक प्रकार का अपराध है। यहीं से कृष्ण और लोकतंत्र के बीच एक महत्वपूर्ण संवाद शुरू होता है। कृष्ण का ‘धर्म’ किसी एक धर्म या संप्रदाय की सत्ता नहीं है। वह कर्तव्य और न्याय का बोध है। शासन का धर्म है कि वह कमजोर को सुरक्षा दे, नागरिकों को समान अवसर दे और कानून के सामने सबको बराबर रखे। संविधान का अनुच्छेद 38 भी राज्य से सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय तथा असमानताओं को कम करने की दिशा में काम करने की अपेक्षा करता है। लेकिन आज की राजनीति में प्रश्न यह है कि क्या सत्ता का केंद्र वास्तव में लोककल्याण है? राजनीति में विचारधाराओं का संघर्ष लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों आवश्यक हैं। समस्या तब शुरू होती है जब जनहित पीछे चला जाता है और राजनीतिक हित आगे आ जाता है। चुनाव जीतने के लिए समाज को धर्म, जाति, क्षेत्र और पहचान के आधार पर बांटना आसान राजनीति हो सकती है, लेकिन यह उस भारत की कल्पना नहीं हो सकती जिसमें संविधान बंधुत्व और व्यक्ति की गरिमा की बात करता है। कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध के मैदान में खड़ा करके केवल युद्ध करना नहीं सिखाया, उन्होंने उसे मोह से बाहर निकलकर विवेक से निर्णय लेने की प्रेरणा दी। आज राजनीति को भी इसी विवेक की जरूरत है। कृष्ण की राजनीति में एक और महत्वपूर्ण बात दिखाई देती है – नीति। वे जानते थे कि केवल आदर्शों की बात करने से व्यवस्था नहीं चलती। आज राजनीतिक दलों के सामने यही सबसे बड़ी परीक्षा है। क्या सत्ता में बने रहने के लिए हर समझौता उचित है? क्या राजनीतिक लाभ के लिए समाज में विभाजन स्वीकार किया जा सकता है? क्या विरोधी विचार रखने वाला व्यक्ति राष्ट्रविरोधी हो जाता है? क्या आलोचना को दुश्मनी समझना लोकतंत्र की स्वस्थ परंपरा है? श्रीकृष्ण का संदेश इन सवालों का उत्तर खोजने में मदद कर सकता है। आज भारत को कृष्ण की सबसे अधिक जरूरत मंदिरों और उत्सवों से बाहर राजनीतिक और सामाजिक आचरण में है। आज राजनीति को कृष्ण की तस्वीर से अधिक उनके विचारों की आवश्यकता है।
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