
परिचय👇
ūभक्तों ने दर्शन करते समय देखा कि लक्ष्मीनारायण स्वामी, जगन्नाथ स्वामी, शंकर जी, गणेश जी, भगवान श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण, हनुमानजी, और शनि देव को खड़ा, ऊनी शॉल, मफलर और गर्म अंगवस्त्रों से अभिषेक किया गया था। यह दृश्य न केवल पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना बल्कि उनमें एक गहरी आध्यात्मिक भावना भी जागृत की गई..
- कटनी – यशभारत -]जैसे-जैसे ठंड का प्रकोप बढ़ता जा रहा है, वैसे-वैसे इसका असर जनजीवन के साथ-साथ धार्मिक स्थलों पर भी साफ दिखाई देने लगा है। पिछले कुछ दिनों से रात और सुबह के समय ठंड का प्रकोप बढ़ता जा रहा है। इसी के साथ शहर के प्रमुख पौराणिक कथाओं में एक अनोखी और अनोखी परंपरा भी देखने को मिली, जिसमें देवताओं की झलक के साथ गर्म वस्त्र पहने गए। रविवार की सुबह शहर के प्रसिद्ध मंदिर में स्वामी भाई बलराम जी औऱ बहन सुभद्रा जी के साथ जगत के प्रसिद्ध लक्ष्मी नारायण मंदिर में दर्शन किए गए। जगत के पालनहार जगदीश स्वामी जी के शनिवार की सुबह सर पर मुकुट की जगह पर गर्म टोपी और गर्म कंवल में भक्तों को दर्शन देने के लिए द्वार में पधारे दिए गए, इसी तरह शहर के लगभग हर मंदिर में भगवान के गर्म फूल से सुशोभित हो रहे हैं।
“सेवा सबसे बड़ी भक्ति” – पुजारी
मंदिर के वरिष्ठ पुजारियों का कहना है कि देव प्रतिमाओं की सेवा करना हिंदू परंपरा का सिद्धांत है। जैसे जीवन में ऋतु परिवर्तन होते हैं, वैसे ही देवताओं की सेवा में भी मौसम के अनुसार परिवर्तन होते हैं। लक्ष्मीनारायण मंदिर के मुख्य पुजारी दुर्गा प्रसाद यीशु ने बताया कि जब भी मौसम बदलता है तो प्रभु के वस्त्र, आसन और श्रृंगार भी एक ही समय में बदल जाते हैं। यह केवल परंपरा नहीं, बल्कि श्रद्धा और प्रेम की अभिव्यक्ति है। ठंड में जैसे हम अपने बच्चों को खड़े कपड़े पहनाते हैं, ठीक वैसे ही प्रभु की सेवा भी होती है। उन्होंने बताया कि इस साल शुरुआती ठंड और तापमान में भारी गिरावट को देखते हुए पहले ही दिन ऊनी वस्त्रों की व्यवस्था कर दी गई थी।
अलग-अलग देवी-देवताओं का विशेष श्रृंगार
प्रत्येक देव प्रतिमा के लिए विशेष प्रकार के वस्त्र तैयार किये गये। राधा मोहन जी को लाल रंग की ओनी शॉल ओढ़ाई गई, भगवान श्रीराम और लक्ष्मण को लाल रंग की ओनी अंगवस्त्र की माला पहनाई गई, जबकि माता सीता के लिए पिंक और तीखा रंग का हॉट पोशाक तैयार की गई गणेश जी को लाल रंग की ऊनी शॉल ओढ़ाई गई, भगवान श्रीराम और लक्ष्मण को लाल रंग की ओनी अंगवस्त्र पहनाई गई। शनिदेव को काले रंग के ऊनी वस्त्र पहने गए और उनके आसन पर भी गर्म कपड़े पहने गए। इसे “शनि शीतल सेवा” कहा जा रहा है, जो हर साल ठंड के मौसम में दी जाती है।
भक्तों की भागीदारी ने साझेदारी साझेदारी
यह धार्मिक आयोजन केवल पुजारियों तक सीमित रूप से नहीं किया गया। बड़ी संख्या में अपने घरों से स्वहस्त निर्मित छोटे-छोटे कांटे, टोपी और शॉल लेकर मंदिर तक पहुंच रहे हैं। कुछ महिलाओं ने ऊन से खुद को कपड़े पहनाकर प्रभु को भी धोखा दिया। एक बुजुर्ग बूढ़ी माता ने भावुक होकर कहा कि भगवान हमारे-पिता हैं। जैसे हम घर के बुजुर्गों का ध्यान रखते हैं, वैसे ही ईश्वर की सेवा भी हमारा धर्म है। आज उन्हें गर्म कपड़े पहने दिल को बड़ी शांति मिली।
सुबह की आरती के समय मंदिर का माहौल पूरी तरह बदल गया। दीपकों की लौ, अगरबत्ती की ध्वनि, घंटियों की मधुर आवाज और ऊनी वस्त्रों में आकर्षक देव प्रतिमाओं का दृश्य वातावरण और भी अधिक दिव्य बना रहा था। भक्तों का मानना है कि इस तरह का कोई विशेष परंपरा नहीं है, बल्कि यह ठंड के मौसम में सकारात्मक ऊर्जा और आत्मिक सार्वभौम भी प्रदान करता है। कई लोगों ने इसे “भक्ति की गर्माहट” कहा।
बच्चों और युवाओं में विशेष उत्साह
इस अनोखी परंपरा को लेकर बच्चों और युवाओं में भी उत्साह नजर आया। कई युवाओं ने तस्वीरों में ये दृश्य की तस्वीरें और वीडियो बनाए, जिन्हें सोशल मीडिया पर शेयर किया गया। हालाँकि प्रशासन मंदिर ने मठ से अपील की कि वे स्थलों की पवित्रता बनाये रखें।
सामाजिक एवं सांस्कृतिक संदेश
धार्मिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह परंपरा केवल आस्था तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा सामाजिक संदेश भी छिपा हुआ है। विशिष्ट मौसम के साथ जीवन में संतुलन बनाना, अपने आस-पास के लोगों का मूल रखना और प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाए रखना, ये सभी मूल्य इस सांस्कृतिक परंपरा के माध्यम से समाज को दिए जाते हैं।
प्रशासन की ओर से भी
मंदिरों में देखी जा रही है पर्यटकों की भीड़ और आदिवासियों की संख्या को देखते हुए स्थानीय प्रशासन की भी निगरानी की जा रही है।
भक्ति और अपनत्व का अनूठा संगम
यह बदलाव लोगों के लिए एक नई ऊर्जा लेकर आया। जहां एक ओर सर्द हवाएं शरीर को ठिठुरा रही हैं, वहीं दूसरी ओर पीठों के बीच आस्था की गर्माहट वाले लोगों के अवशेष तक पहुंच रही है। देवों को वस्त्र पहनने की यह परंपरा यह संदेश भी देती है कि भक्ति केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि सेवा, भावना और कर्तव्य का नाम है। भक्ति की ऊर्जा आने वाले दिनों में भी बनाएगी आध्यात्मिक ऊर्जा का यह सुंदर एहसास।







