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यश भारत ,संपादकीय

यही ऊर्जा के केंद्र देव या देवता है। प्रकृति की हर शक्ति / ऊर्जा के केंद्र में महादेव है।

वन्दे बोघमयं नित्यं गुरुं शंकर रूपिणम्।
यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते।।

भारतीय संस्कृति एक वृक्ष के समान है, जिसका दृश्य रूप हमें फूल, पत्ती, फल, तना एवं शाखाओं के रूप में दिखाई देता है, जबकि उसकी अदृश्य मूल या जड़ है। वही जड़ इस भारत देश की सनातन संस्कृति का आधार है। गुणधर्म अर्थात् यहाँ गुणधर्म प्रकृति को संचालित करता है, जैसे जल को गुणधर्म जीवन देना है चाहे वह मानव हो, वृक्ष हो या पशु।

यही ऊर्जा के केंद्र देव या देवता है। प्रकृति की हर शक्ति / ऊर्जा के केंद्र में महादेव है।

महा अर्थात बड़ा / विशाल है, इसीलिए बनवासी समाज महादेव को बड़ादेव कहते हैं, जो निराकार है, त्रिशूलधारी है। बड़ादेव, महादेव के समान एक प्राकृतिक शक्ति है जिसमें भूमि, जल, आकाश, वायु और अग्नि आती है, जो सर्वोच्च शक्ति है जिसे कोई मिटा नहीं सकता।

सिंधु घाटी सभ्यता में प्राप्त एक मुहर में तीन मुखों वाली आकृति, चूड़ियां हाथों में और सिंहासन पर विराजित है और सींगोंवाला मुकुट है, यह मूलतः पशुपति मुद्रा में जो आदिम जानवरों गाय, भैंस, बाघ और भेड़िया से घिरा हुआ दिखाई देता है। पशुपति की आकृति को महादेव की प्राचीन मूर्ति मानी जाती है।

सिंधु की अनेक मुहरों पर शिव को वृक्ष की शाखा के रूप में साँपों के बीच में, बलि देते जानवर के साथ दिखाया गया है। वेदों में शिव को अग्नि एवं रूद्र के रूप में पूजा गया है।

ऋग्वेद में शिव को अग्नि वनस्पति अर्थात जंगल के भगवान के रूप में एवं एक अन्य सूक्त में एक हजार शाखाओं वाले सदाबहार, देदीप्यमान वृक्ष के रूप में प्रशंसा की गई है। वृक्ष का संबंध बड़ादेव से भी है, जो साज वृक्ष पर निवास करता है।

वैदिक काल में निरुद्ध पशुयज्ञ होता था, जिसमें एक बकरी का बलिदान 6 माह में या वर्ष में एक बार होता था, वहीं बड़ादेव की पूजा में बली के रूप में बकरों की बलि देने की प्रथा मिलती है। घोड़ों का यज्ञ अनुश्ठान, शatapath ब्राह्मण के यज्ञ अनुश्ठान से मिलता-जुलता है।

हड़प्पा की एक मुहर में शिव एवं एक व्यक्ति का भैंस पर भाला चलाते हुए चित्रण किया गया है, अनुमान है कि यह महाभारत के कंस वध की कथा का द्योतक है। इसी प्रकार भारतीय धर्म की अनेक जनजातियों में प्रचलित है।

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