दूध माफिया का अमानवीय चेहरा: नवजात बछड़ों की दरिंदगी से उभरी सच्चाई
मुनाफाखोरी ने इंसानियत को पीछे छोड़ दिया, प्रशासन की चुप्पी पर उठ रहे सवाल

जबलपुर यशभारत। मुनाफाखोरी और पैसों की हवस ने शहर के दूध माफियाओं और बड़े डेयरी संचालकों को इतना अमानवीय बना दिया है कि नवजात बछड़ों की हत्या जैसी घटनाएँ आम होती जा रही हैं। स्थानीय सूत्रों और पशु अधिकार कार्यकर्ताओं के अनुसार, बड़ी डेयरियों में जब भैंसें बछड़े को जन्म देती हैं, तो संचालक उन्हें पर्याप्त दूध नहीं पिलाते और कई बार नवजात बछड़े को सड़क या कचरे के ढेर में फेंक दिया जाता है। भूख और प्यास से तड़पते बछड़े की मौत होना आम बात बन चुकी है।
सड़कों पर बिखरे मृत बछड़े, प्रशासन की नाकामी
स्थानीय लोग बताते हैं कि सुबह-सुबह जब कुछ इलाकों में बड़ी डेयरियाँ खुलती हैं, तो मृत बछड़ों के शव सड़क किनारे और आसपास कचरे में पड़े दिख जाते हैं। डेयरियों के संचालक इसे छिपाने के लिए बाकायदा वाहन बुलाते हैं जो शव उठाकर ले जाते हैं। पशु अधिकार कार्यकर्ता मानते हैं कि यह न केवल मुनाफाखोरी है, बल्कि नैतिक और कानूनी अपराध भी है।
दूध देना बंद होते ही कटती है भैंस की जिंदगी
सूत्रों के अनुसार, डेयरियों में भैंस तब तक सुरक्षित रहती हैं जब तक दूध देती हैं। जैसे ही दूध देना बंद करती हैं, उन्हें तुरंत कसाइयों के हवाले कर दिया जाता है। यह व्यवहार हजारों रुपये कमाने के बाद भैंस के साथ की जाने वाली क्रूरता की गवाही है।
पशु क्रूरता अधिनियम और कानून की उपेक्षा
पशु अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस प्रकार की घटनाएँ पशु क्रूरता अधिनियम, 1960 के तहत अपराध हैं। इसके अंतर्गत पशुओं के प्रति अमानवीय व्यवहार पर कड़ी सजा का प्रावधान है। इसके बावजूद अधिकारियों की नियमित जांच नहीं होती और डेयरियों की निगरानी कमजोर है।
कानूनी विशेषज्ञ डॉ. रश्मि वर्मा का कहना है:
“डेयरी में नवजात बछड़े को पर्याप्त दूध न देना और उसे मार डालना न केवल नैतिक अपराध है, बल्कि कानूनी दृष्टि से भी गंभीर मामला है। प्रशासन को तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए।”
समाजसेवियों और पशु अधिकार कार्यकर्ताओं की प्रतिक्रिया
समाजसेवी और पशु प्रेमियों ने चेतावनी दी है कि यदि प्रशासन ने जल्द कार्रवाई नहीं की तो यह मामला सार्वजनिक आंदोलन का रूप ले सकता है।
स्थानीय पशु प्रेमी सुधीर सोनू दुबे रणधीर सिंह बीन्नू उर्फ दिनेश कनौजिया तबस्सुम अंसारी मनजीत पिंटू पंड्या अप्पू गुप्ता आदि ने कहा कि “दूध माफिया केवल मुनाफाखोर नहीं हैं, वे नवजात पशुओं के हत्यारे भी हैं। प्रशासन की चुप्पी उन्हें और भी निडर बना रही है।”
सकारात्मक पहल की आवश्यकता
विशेषज्ञों का सुझाव है कि डेयरियों में पशु कल्याण व्यवस्था को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए। इसमें शामिल हो सकते हैं:
* नवजात बछड़ों को पर्याप्त दूध उपलब्ध कराना
* मृत पशुओं के निस्तारण के लिए पारदर्शी व्यवस्था
* डेयरियों पर नियमित निरीक्षण और कानूनन कार्रवाई
* पशु कल्याण जागरूकता कार्यक्रम
स्थानीय प्रशासन की भूमिका
पशु क्रूरता और डेयरी निगरानी में स्थानीय अधिकारियों की उदासीनता सवाल खड़े कर रही है। पशु अधिकार कार्यकर्ता मांग कर रहे हैं कि डेयरियों की नियमित जांच और भयंकर घटनाओं पर त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
समाप्ति टिप्पणी
जबलपुर में दूध माफिया की यह करतूत सिर्फ मुनाफाखोरी नहीं बल्कि मानवता और नैतिकता के खिलाफ अपराध है। नवजात बछड़ों के साथ अमानवीय व्यवहार ने पूरे शहर में चिंता और आक्रोश को जन्म दिया है। विशेषज्ञ और समाजसेवी चेतावनी दे रहे हैं कि यह मामला अब केवल पशु क्रूरता का नहीं, बल्कि समाज के नैतिक संकट का भी प्रतीक बन चुका है।








