भाद्रपद पूर्णिमा से पितृपक्ष का शुभारंभ,पूर्वजों को नमन, तर्पण और होंगे पिंडदान
नर्मदा तटों पर सुबह से पहुंचने लगे लोग, 15 दिनों तक लगा रहेगा तांता

जबलपुर, यशभारत।भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि से रविवार को पितृपक्ष का शुभारंभ हो गया। नर्मदा तट ग्वारीघाट, तिलवाराघाट सहित अन्य घाटों पर सुबह से श्रद्धालु हाथों में कुश लेकर वैदिक रीति से पूर्वजों का स्मरण करते दिखाई दिए। पुरोहितों के मार्गदर्शन में विधिवत पिंडदान, तर्पण और जलदान की प्रक्रिया प्रारंभ हुई। मान्यता है कि इस पक्ष में पितर धरती पर आते हैं और श्राद्ध कर्म से प्रसन्न होकर अपने वंशजों को शुभाशीष देते हैं।
15 दिन का होगा पितृपक्ष
इस बार पितृपक्ष 16 की बजाय 15 दिनों का रहेगा। कारण यह है कि 15 सितंबर को अष्टमी और नवमी का श्राद्ध एक ही दिन किया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्रत्येक पूर्वज की अपनी निश्चित तिथि होती है, जिस दिन उनके लिए तर्पण या श्राद्ध किया जाता है। जिनके निधन की तिथि ज्ञात नहीं होती, उनके लिए अमावस्या के दिन तर्पण करना शुभ माना जाता है।
पौराणिक मान्यताओं से जुड़ा महत्व
पौराणिक मान्यता है कि पितृपक्ष के दौरान पंद्रह दिनों के लिए पितरों का धरती पर आगमन होता है। वे अपने वंशजों के घर में आते हैं और यथोचित आदर, श्रद्धा तथा विधिपूर्वक किए गए श्राद्ध से प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं। यदि उचित विधि से श्राद्ध न किया जाए या अनादर हो, तो पितर अप्रसन्न होकर परिवार में बाधाएँ उत्पन्न कर सकते हैं।
श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान की परंपरा
पितृपक्ष में प्राचीनकाल से ही पिंडदान और तर्पण की परंपरा रही है। पिंडदान को पितरों की आत्मा की तृप्ति और मोक्ष प्राप्ति का मार्ग माना जाता है। श्राद्ध के समय जल, तिल, कुश और अन्न का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, श्राद्ध से प्राप्त पुण्य केवल पितरों को ही नहीं, बल्कि पूरे कुल को कल्याणकारी फल देता है।
पूर्वजों का आशीर्वाद है जीवन की संपदा
पितृपक्ष के पहले दिन से ही लोग अपने पूर्वजों की स्मृति में आहुतियाँ देने लगते हैं। यह विश्वास किया जाता है कि प्रसन्न पितर परिवार में सुख-समृद्धि, आरोग्य और संतान की वृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। वहीं, यदि वे नाराज हों तो घर-परिवार में असंतोष और विघ्न उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार पितृपक्ष न केवल धार्मिक कर्मकांड का अवसर है, बल्कि यह परिवार और समाज को अपने पूर्वजों की परंपराओं से जोड़ने वाली कड़ी भी है।







