सागर के पहलवान बब्बा मंदिर को शासन के अधिग्रहण का आदेश निरस्त, मामला फिर कमिश्नर के पास भेजा
सरकारी फंड के बिना मंदिर को सरकारी नियंत्रण में नहीं माना जा सकता: हाईकोर्ट

जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर पीठ ने सागर स्थित प्रसिद्ध पहलवान बब्बा हनुमान मंदिर को शासन के नियंत्रण में लेने संबंधी आदेश को निरस्त कर दिया है। न्यायमूर्ति विशाल मिश्रा की एकलपीठ ने कहा कि किसी मंदिर को शासकीय देवस्थान मानने के लिए उसके रखरखाव हेतु सरकारी फंड प्राप्त होना आवश्यक है। यदि मंदिर को सरकारी सहायता नहीं मिल रही है, तो उसे सीधे सरकारी नियंत्रण में लेना नियमों के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
याचिकाकर्ता रामेश्वर प्रसाद तिवारी, जो मंदिर के संस्थापक हैं, ने शासन द्वारा शासकीय देवस्थान प्रबंध समिति नियम, 2019 के तहत मंदिर को अपने नियंत्रण में लेकर नई शासकीय समिति गठित किए जाने के आदेश को चुनौती दी थी। इस संबंध में दायर अपील को संभागायुक्त सागर ने खारिज कर दिया था, जिसके बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याचिका में बताया गया कि करीब 40 वर्ष पहले जिला न्यायालय सागर के समीप स्थित जर्जर मंदिरों और खाली पड़ी भूमि पर असामाजिक तत्वों का जमावड़ा रहता था। तब रामेश्वर प्रसाद तिवारी और अन्य युवाओं ने कारसेवा के माध्यम से क्षेत्र का विकास शुरू किया। बाद में यहां हनुमान मंदिर सहित कई अन्य मंदिरों का निर्माण एवं जीर्णोद्धार कराया गया। परिसर में बड़े स्तर पर वृक्षारोपण भी किया गया, जिससे यह क्षेत्र धार्मिक एवं पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण बन गया।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता आशीष त्रिवेदी ने तर्क दिया कि नियम 1(जी) के अनुसार किसी मंदिर को सरकारी नियंत्रण में मानने के लिए उसे सरकारी निधि से सहायता प्राप्त होना आवश्यक है। चूंकि पहलवान बब्बा मंदिर को किसी प्रकार की सरकारी आर्थिक सहायता नहीं मिल रही है, इसलिए उस पर 2019 के नियम लागू नहीं किए जा सकते।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि मंदिर के रखरखाव के लिए सरकारी धन उपलब्ध कराए जाने संबंधी महत्वपूर्ण तथ्य पर न तो प्रशासनिक अधिकारियों ने और न ही संभागायुक्त ने पर्याप्त विचार किया। न्यायालय ने माना कि इस पहलू की अनदेखी करते हुए पारित आदेश विधिसम्मत नहीं है।
अदालत ने 2 सितंबर 2024 को संभागायुक्त सागर द्वारा पारित आदेश को निरस्त करते हुए मामला पुनः उनके पास भेज दिया है। साथ ही निर्देश दिए हैं कि याचिकाकर्ता की अपील पर नए सिरे से सुनवाई कर प्रस्तुत सभी तर्कों और तथ्यों पर विचार करते हुए निर्णय लिया जाए। मामले में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता आनंद शुक्ला और अपूर्व त्रिवेदी ने भी पैरवी की।







