फैटी लिवर रोग से बढ़ता है कैंसर का खतरा

फैटी लिवर रोग से बढ़ता है कैंसर का खतरा
भोपाल, यशभारत। एम्स भोपाल लगातार चिकित्सा अनुसंधान और रोगी देखभाल को जोड़ते हुए नई उपलब्धियां हासिल कर रहा है। संस्थान के जैवरसायन विभाग में एमडी थीसिस के अंतर्गत फैटी लिवर रोग पर एक महत्वपूर्ण शोध प्रस्तुत किया गया। यह शोध डॉ. दीपा रोशनी द्वारा, डॉ. सुखेस मुखर्जी के मार्गदर्शन में, एम्स भोपाल में आयोजित चौथे रिसर्च डे के दौरान प्रस्तुत किया गया। यह अध्ययन गैर-अल्कोहलिक फैटी लिवर रोग और मेटाबॉलिक एसोसिएटेड स्टेटोटिक लिवर डिजीज के बढ़ते वैश्विक और भारतीय बोझ पर केंद्रित है। इसमें बताया गया कि यह रोग साधारण फैटी लिवर से लेकर स्टेटोहेपेटाइटिस, फाइब्रोसिस, सिरोसिस और लिवर कैंसर तक बढ़ सकता है। वर्तमान जांच विधियाँ जैसे लिवर एंजाइम, इमेजिंग और बायोप्सी कई सीमाओं से जुड़ी हैं।
शोध में एड्रोपिन और आइरिसिन को ऊर्जा संतुलन से जुड़े हार्मोन तथा साइटोकेराटिन-18 को लिवर कोशिकाओं की क्षति का संकेतक माना गया। अध्ययन में पाया गया कि रोग की गंभीरता बढऩे के साथ एड्रोपिन और आइरिसिन का स्तर घटता गया, जबकि साइटोकेराटिन-18 का स्तर बढ़ता गया। यह बदलाव बॉडी मास इंडेक्स, लिवर एंजाइम और लिपिड प्रोफाइल में गिरावट के साथ स्पष्ट रूप से देखा गया।
आंकड़ों के विश्लेषण से यह भी सामने आया कि साइटोकेराटिन-18 की पहचान क्षमता सबसे अधिक रही, जबकि तीनों बायोमार्करों को एक साथ देखने पर रोग की गंभीरता का आकलन और बेहतर हुआ। ायोइन्फॉर्मेटिक अध्ययन में संबंधित जीन की अभिव्यक्ति में भी महत्वपूर्ण बदलाव पाए गए, जो इन निष्कर्षों को मजबूती प्रदान करते हैं। यह शोध दर्शाता है कि एड्रोपिन, आइरिसिन और साइटोकेराटिन-18 फैटी लिवर रोग की शुरुआती पहचान, जोखिम निर्धारण और निगरानी के लिए उपयोगी गैर-आक्रमक बायोमार्कर बन सकते हैं। साथ ही, भविष्य में बड़े बहु-केंद्रित अध्ययनों की आवश्यकता पर भी बल दिया गया। इस अवसर पर एम्स भोपाल के कार्यपालक निदेशक प्रो. (डॉ.) माधवानन्द कर ने कहा कि यह शोध फैटी लिवर जैसे तेजी से बढ़ते रोग की समय पर पहचान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। उन्होंने बताया कि गैर-आक्रामक बायोमार्करों पर आधारित यह अध्ययन रोगियों को अधिक सटीक, सुरक्षित और प्रभावी जांच की सुविधा प्रदान करने की दिशा में एक सार्थक पहल है।







