शोभा की सुपारी बना पुस्तक मेला,निजी स्कूलों और प्रकाशकों की मनमानी
अजय बिश्नोई का तंज

यश भारत, जबलपुर। अभिभावकों को निजी स्कूलों और प्रकाशकों की मनमानी से राहत दिलाने के उद्देश्य से शुरू किया गया पुस्तक मेला इस वर्ष अपने मूल मकसद से भटकता नजर आ रहा है। दो साल पहले जिला प्रशासन की सख्ती के चलते इस मेले के माध्यम से किताबें, कॉपियां और अन्य शिक्षण सामग्री उचित व रियायती दरों पर उपलब्ध कराई जा रही थीं। इससे जहां अभिभावकों को राहत मिली थी, वहीं चुनिंदा विक्रेताओं और प्रकाशकों की मोनोपोली भी कमजोर हुई थी। उस दौरान 20 से 30 प्रतिशत तक का डिस्काउंट भी देखने को मिला था।

लेकिन इस बार स्थिति बदलती दिखाई दे रही है। मेले में सीमित छूट और कई जगह महंगे दामों पर किताबों के सेट बेचे जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं। अभिभावकों का कहना है कि मेला अब अपने उद्देश्य से हटकर औपचारिकता बन गया है और अपेक्षित पारदर्शिता नहीं दिख रही।
नही हुई FIR
इधर, कुछ प्रकाशकों द्वारा चुनिंदा विक्रेताओं को ही किताबें उपलब्ध कराने की शिकायतें भी सामने आई हैं। मामले में जांच के बाद एक प्रकाशक पर एफआईआर दर्ज करने का निर्णय लिया गया था, लेकिन दो सप्ताह बीतने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हो सकी है।
ऐसे में सवाल उठने लगे हैं कि क्या पुस्तक मेला अब केवल दिखावे तक सीमित रह गया है, जबकि अभिभावक एक बार फिर महंगी किताबों के बोझ तले दबने को मजबूर हैं।
अजय बिश्नोई का तंज
पाटन विधायक अजय बिश्नोई ने सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से जिला प्रशासन पर निशाना साधते हुए कहा कि “निजाम बदला, मिजाज बदला।” उन्होंने आरोप लगाया कि पूर्व में प्रशासन की सख्ती से निजी स्कूलों और विक्रेताओं के गठजोड़ पर अंकुश लगा था, लेकिन अब प्रशासन की दूरी से विक्रेताओं के हौसले फिर बढ़ गए हैं और महंगी दरों पर किताबें बेची जा रही हैं।







