
लोकसभा में दो दिनों से चल रहे तीखे राजनीतिक हंगामे के बीच कांग्रेस सांसद राहुल गांधी बुधवार को भारतीय सेना के पूर्व प्रमुख जनरल (रिटायर्ड) एम.एम. नरवणे की चर्चित किताब फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी हाथ में लेकर संसद पहुंचे। राहुल गांधी ने न केवल किताब को सदन में दिखाया, बल्कि उसका वह पन्ना खोलकर भी पढ़ा, जिसमें कथित तौर पर प्रधानमंत्री द्वारा सेना प्रमुख से कहा गया— “जो उचित समझो, वह करो।”
ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से अचानक गायब हुई किताब
हैरानी की बात यह रही कि जिस समय संसद में यह किताब चर्चा के केंद्र में थी, उसी वक्त यह पुस्तक Amazon, Flipkart और Penguin Random House India की आधिकारिक वेबसाइट से पूरी तरह गायब पाई गई। ऐसे में सवाल उठने लगे कि जब किताब सार्वजनिक रूप से उपलब्ध ही नहीं थी, तो वह राहुल गांधी तक कैसे पहुंची?
सरकार के दावों पर राहुल का पलटवार
राहुल गांधी ने सदन में पुस्तक दिखाते हुए कहा कि सरकार और रक्षा मंत्री लगातार यह कह रहे हैं कि ऐसी किसी किताब का अस्तित्व ही नहीं है। उन्होंने पलटवार करते हुए कहा— “देखिए, यह रही किताब। अगर आज प्रधानमंत्री लोकसभा में आते हैं तो मैं खुद जाकर उन्हें यह किताब दूंगा, ताकि वे इसे पढ़ सकें और देश को सच्चाई पता चल सके।”
कुछ ही घंटों में ‘अनुपलब्ध’ हुई पुस्तक
इसी बीच एक और चौंकाने वाला तथ्य सामने आया। जिस पुस्तक को राहुल गांधी संसद में लहराते दिखे, वह उसी दिन प्रमुख ऑनलाइन बुक स्टोर्स पर उपलब्ध नहीं पाई गई। वेबसाइट पर खोज करने पर यह या तो “अनुपलब्ध” दिखाई दी या पूरी तरह हटा दी गई थी। यह घटनाक्रम राहुल गांधी द्वारा पुस्तक के अंश पढ़े जाने के कुछ ही घंटों बाद सामने आया।
राहुल गांधी तक किताब कैसे पहुंची?
अब सबसे बड़ा और संवेदनशील सवाल यह है कि आखिर यह किताब राहुल गांधी के पास आई कैसे? आधिकारिक तौर पर यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि उन्होंने इसे सीधे प्रकाशक से प्राप्त किया या किसी अन्य माध्यम से।
क्या लेखक ने स्वयं उपलब्ध कराई पुस्तक?
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि क्या लेखक स्वयं, यानी पूर्व सेना प्रमुख जनरल नरवणे ने यह पुस्तक राहुल गांधी को उपलब्ध कराई, या फिर किसी तीसरे स्रोत के जरिए यह किताब कांग्रेस नेता तक पहुंची। फिलहाल न तो लेखक की ओर से कोई सार्वजनिक बयान आया है और न ही प्रकाशक की तरफ से यह स्पष्ट किया गया है कि किताब बाजार से क्यों और किसके निर्देश पर हटाई गई।
सिर्फ किताब नहीं, अब बड़ा राजनीतिक सवाल
कुल मिलाकर, संसद में किताब लहराने से शुरू हुआ यह विवाद अब एक बड़े राजनीतिक और संस्थागत सवाल में बदल चुका है—क्या सच सामने आने से पहले ही उसे बाजार से गायब कर दिया गया, और क्या देश को वह जानकारी पढ़ने से रोका जा रहा है, जिसकी चर्चा संसद के भीतर हो रही है?








