देवी जागरण, माता की चौकी के बाद भजन जैमिंग, अजीत मिनोचा परिवार की तीसरी पीढ़ी मैदान में

जबलपुर,यशभारत। माँ भगवती को रिझाने की पंजाबी परंपरा देवी जागरण, माता की चौकी के बाद भजन-जैमिंग तक के सफर को साझा करने के लिये आज अजीत (पिता) एवं ईशान मिनोचा (पुत्र) यशभारत के प्राइम टाइम विथ आशीष शुक्ला में रूबरू हुए। अजीत मिनोचा ने अपने पिता स्व. के. बी. मिनोचा के साथ शुरू किये गये सफर को ताजा किया तो पुत्र ईशान ने मुंबई में सुरेश वाडेकर से गुरु-शिष्य परंपरा के संगीत ज्ञान की परतें खोलीं। जबलपुर में भजन गायकी के पितामह अजीत मिनोचा बताते हैं कि उनके पिता स्वर्गीय के बीच मिनोचा स्वयं उर्दू में भजन लिखा करते थे और देवी जागरण किया करते थे। सन् 1982 में उन्होंने पिता के साथ गायिकी शुरू की जो अब तक जारी है। देवी जागरण पंजाबी परंपरा है बजे शुरू होती और सुबह 4 बजे कथा और जो रात 10 बजे आरती के साथ समाप्त होती। फिर ‘माता की चौकी’ आई, जो पहले रात 9 से 12 बजे तक चलती थी, अब वह 6 से 9 बजे भी चलती है।
सुरेश वाडेकर से सीखा भजन गायन : ईशान
अजीत मिनोचा के पुत्र ईशान उसी परंपरा को आगे बढ़ाने के लिये तत्पर हैं। वे जहाँ पिता के साथ माता की चौकी में गाते हैं, वहीं भजन-जैमिंग उनका नया शगल है। ईशान बताते हैं कि सारी दुनिया तारीफ करती है लेकिन माता-पिता ही हैं जो गलतियाँ बताते व सुधार कराते हैं। उन्होंने यूँ तो तबला वादन से शुरुआत की लेकिन फिर दिलीप कोरी व कुलदीप जी से संगीत की शिक्षा हासिल की। फिर उन्होंने मुंबई में सुरेश वाडेकर की एकेडमी में गुरु-शिष्य परंपरा से संगीत की शिक्षा हासिल की। फिर उनके साथ मंच भी साझा किया। वे उनके ज्ञान व संदेश को अपने लिये अहम् मानते हैं।
बेटियां क्यों पराई की दूसरी पीढ़ी
ईशान भजन-जैमिंग को आज का नया प्रयोग मानते हैं, जिसमें गायक के साथ श्रोता भी गाते और झूमते हैं। वे कहते हैं कि ‘दर्शनों की आस लेकर, आया तेरे द्वार माँ…’ उनकी नई प्रस्तुति है, जो इस बार मंचों पर गाया जायेगा। वे बताते हैं कि पिता के गाया गाया ‘बेटियाँ क्यों पराई हैं…’ ने राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त की है। पंजाब तक में इसे श्रद्धा के साथ गाया जाता है। संगीतकार बबलू मैथ्यू के आग्रह पर उन्होंने भी इसे गाया है, जिसके श्रोता मिलियन्स में हैं।
भजनों के साथ वैष्णव देवी की ट्रेन यात्रा
अजीत जी कहते हैं कि माँ भाव की भूखी होती हैं, जिसमें डूबना जरूरी है। सभी श्रोताओं को डुबायेंगे। उन्होंने बताया कि सन् 1989 से वे वैष्णव देवी जा रहे हैं, जिसका काफिला निरंतर बढ़ता गया। पहले सबलदास जी खत्री अब महापौर जगत बहादुर सिंह अन्नू ट्रेन से यात्रा ले जाते हैं। वे तब से लेकर अब तक उसका हिस्सा हैं। वे अपने प्रिय भजन ‘मुझे माँ से गिला, मिला ये सिला, बेटियाँ क्यों पराई हैं…’ की राष्ट्रीय स्तर की ख्याति को लेकर…… भाव विभोर हो उठते हैं।








