
गौशाला की तस्वीर ने खोली निगम के स्वास्थ्य विभाग की पोल!

स्वास्थ्य अधिकारी की सफाई के बाद भी सवाल कायम
सबसे ज्यादा आउटसोर्स कर्मचारियों की फौज के बावजूद गौशाला से लेकर शहर की सफाई व्यवस्था तक बदहाल, निगरानी और खर्च पर उठ रहे सवाल
कटनी, यशभारत। अमीरगंज गौशाला को लेकर सामने आए वायरल वीडियो में कई मवेशी मृत अथवा बेहद कमजोर हालत में दिखाई देने औऱ आई खबरो के बाद नगर निगम के स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवालों की बौछार शुरू हो गई है। आनन फाफन ने निगम के स्वास्थ्य अधिकारी संजय सोनी ने देर शाम सफाई देते हुए कहा है कि मृत मवेशी गंभीर रूप से बीमार और निराश्रित थे, जिन्हें शहर के अलग-अलग हिस्सों से रेस्क्यू किया गया था और उपचार के प्रयासों के बावजूद नहीं बचाया जा सका।
निगम की यह सफाई अपने साथ कई नए सवाल भी खड़े करती है। यदि पशु गंभीर रूप से बीमार थे तो उनकी नियमित निगरानी कौन कर रहा था? पशु चिकित्सक की मौजूदगी कितनी नियमित थी? उपचार का रिकॉर्ड क्या है? कितने पशु रेस्क्यू किए गए, कितने स्वस्थ हुए और कितनों की मौत हुई?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि निगम के स्वास्थ्य विभाग के पास आउटसोर्स कर्मचारियों की बड़ी फौज है। सफाई, स्वास्थ्य और मैदानी व्यवस्थाओं के लिए बड़ी संख्या में कर्मचारी लगाए जाने के बावजूद यदि गौशाला में ऐसी स्थिति सामने आने का दावा हो रहा है और शहर के कई हिस्सों में गंदगी की शिकायतें लगातार बनी हुई हैं, तो फिर इस पूरी मशीनरी की निगरानी कौन कर रहा है?
कर्मचारियों की फौज, फिर भी शहर में गंदगी क्यों?
अमीरगंज गौशाला को अकेली घटना मानकर मामला खत्म नहीं किया जा सकता। शहर के कई हिस्सों में कचरा, नालियों की गंदगी, जलभराव और सफाई व्यवस्था को लेकर नागरिकों की शिकायतें सामने आती रही हैं। सवाल यह है कि जब स्वास्थ्य विभाग के पास इतनी बड़ी संख्या में आउटसोर्स कर्मचारी हैं तो मैदानी सफाई की नियमित मॉनिटरिंग क्यों नहीं हो रही? कर्मचारी वास्तव में कहां तैनात हैं और उनकी हाजिरी एवं काम की निगरानी कैसे होती है?
यही वह बिंदु है जहां व्यवस्था के साथ-साथ आउटसोर्स व्यवस्था पर होने वाले खर्च और उसकी निगरानी को भी जांच के दायरे में लाने की जरूरत महसूस होती है। यदि भुगतान नियमित हो रहे हैं लेकिन जमीन पर सफाई और निगरानी अपेक्षित स्तर पर नहीं है तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। और यदि कहीं फर्जी उपस्थिति, काम में लापरवाही, भुगतान या ठेके से जुड़ी अनियमितता के आरोप हैं तो उनकी जांच रिकॉर्ड के आधार पर होनी चाहिए।
गौशाला में चार कर्मचारी, फिर निगरानी कहां?
निगम का कहना है कि गौशाला में चार कर्मचारी, सुपरवाइजर और हांका गैंग प्रभारी तैनात हैं। तीन शिफ्ट में सफाई का दावा भी किया गया है। इसके बावजूद बारिश के दौरान परिसर में कीचड़ और अव्यवस्था की तस्वीर सामने आने का दावा हुआ।
तो सवाल सीधा है—इतनी व्यवस्था के बाद भी निगरानी में चूक कैसे हुई? क्या केवल कर्मचारियों की तैनाती पर्याप्त है या उनके काम की वास्तविक मॉनिटरिंग भी होती है?
यदि पशुओं की मौत बीमारी से हुई है तो प्रत्येक पशु का चिकित्सकीय रिकॉर्ड सामने आना चाहिए। यदि मौतें अधिक संख्या में हुईं तो उनके कारणों का पैटर्न भी जांचा जाना चाहिए। केवल यह कहना कि पशु पहले से बीमार थे, स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी को खत्म नहीं करता।
भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच भी जरूरी
स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने के साथ आउटसोर्स कर्मचारियों, सफाई व्यवस्था, पशु चारा, उपचार, दवाओं और गौशाला संचालन पर होने वाले खर्च की भी जांच की मांग उठ रही है। यदि कहीं भ्रष्टाचार या वित्तीय अनियमितता के आरोप हैं तो उनका फैसला आरोपों से नहीं, दस्तावेजों और जांच से होना चाहिए।
खास बात यह है कि निगमायुक्त द्वारा स्वास्थ्य अधिकारी की कार्यप्रणाली की जांच शुरू किए जाने की जानकारी सामने आ चुकी है। ऐसे में अमीरगंज गौशाला प्रकरण को भी उसी व्यापक जांच के हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए।
क्योंकि सवाल सिर्फ कुछ मृत मवेशियों का नहीं है। सवाल उस पूरे स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली का है, जिसके पास कर्मचारियों की बड़ी फौज, संसाधन और जिम्मेदारियां हैं। फिर भी अगर गौशाला से लेकर शहर की सफाई तक शिकायतें सामने आती हैं तो जवाबदेही तय होना जरूरी है।
आखिर इतनी बड़ी मशीनरी के बावजूद लापरवाही क्यों? कर्मचारियों की निगरानी कौन करता है? खर्च का हिसाब कौन देखता है? और यदि व्यवस्था कागज पर दुरुस्त है तो जमीन पर उसकी तस्वीर इतनी अलग क्यों दिखाई देती है?
इन सवालों का जवाब अब महज सफाई से नहीं, निष्पक्ष जांच और कार्रवाई से मिलना चाहिए।
नगर निगम के स्वास्थ्य अधिकारी संजय सोनी ने गौशाला की व्यवस्था फ़ोटो और व्यवस्था दुरुस्त किए जाने के बयान जारी किए है।







