छोटू ठाकुर और राजेश ठाकुर पर NSA हाई कोर्ट ने किया रद्द, गलत रिकॉर्ड और अफसरों की जल्दबाजी पर जताई नाराजगी

जबलपुर, यशभारत। राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत राजेन्द्र ठाकुर उर्फ छोटू और राजेश ठाकुर उर्फ भैया के खिलाफ जारी निरोध आदेश को हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया। जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनिन्द्र कुमार सिंह की डिवीजन बेंच ने 11 सितंबर को दोनों की रिट याचिकाओं पर फैसला सुनाते हुए जिला मजिस्ट्रेट जबलपुर के 6 जनवरी 2026 के निरोध आदेश को निरस्त कर दिया। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता निखिल तिवारी ने पैरवी की। जिला मजिस्ट्रेट ने दोनों को तीन महीने के लिए निरुद्ध किया था। बाद में निरोध अवधि 1 अप्रैल और 6 जुलाई को तीन-तीन महीने के लिए बढ़ाई गई। प्रशासन ने 20 आपराधिक मामलों और दो प्रतिबंधात्मक कार्यवाहियों को आधार बनाते हुए दोनों को लोक व्यवस्था के लिए खतरा बताया था।
11 मामले पहले ही खत्म, फिर भी रिकॉर्ड में लंबित बताए
हाई कोर्ट ने रिकॉर्ड की जांच में पाया कि प्रशासन ने जिन मामलों को लंबित बताया, उनमें बड़ी संख्या में याचिकाकर्ता पहले ही दोषमुक्त हो चुके थे। कोर्ट के सामने 14 मामलों को विचाराधीन बताया गया, जबकि इनमें से 11 मामलों में याचिकाकर्ता पहले ही दोषमुक्त हो चुके थे। कोर्ट ने माना कि पुलिस की ओर से गलत डेटा उपलब्ध कराया गया, जिसे अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक और पुलिस अधीक्षक ने यांत्रिक तरीके से आगे बढ़ाया। जिला मजिस्ट्रेट ने भी रिकॉर्ड का स्वतंत्र सत्यापन नहीं किया।
एक ही दिन में पूरी हुई कार्रवाई पर सवाल
कोर्ट ने विशेष रूप से इस बात पर सवाल उठाया कि सीएसपी गोहलपुर से लेकर अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक, पुलिस अधीक्षक और जिला मजिस्ट्रेट स्तर तक की पूरी कार्रवाई 6 जनवरी को ही पूरी हो गई। कोर्ट के अनुसार कार्रवाई का क्रम, समय और पत्राचार की भाषा ऐसी स्थिति की ओर इशारा करती है, जिसमें स्वतंत्र विवेक का इस्तेमाल नहीं किया गया। कोर्ट ने यह भी कहा कि सीसीटीएनएस के माध्यम से मामूली प्रयास से आपराधिक मामलों की वास्तविक स्थिति की पुष्टि की जा सकती थी।
बम विस्फोट और CCTV मामले का भी किया परीक्षण
कोर्ट ने 4 जनवरी के कथित बम विस्फोट और सीसीटीवी फुटेज में हेरफेर से जुड़े मामले को भी रिकॉर्ड में देखा। पुलिस अधीक्षक जबलपुर ने सीसीटीवी फुटेज से जुड़े मामले में सब-इंस्पेक्टर दिनेश गौतम को 24 जून को कारण बताओ नोटिस जारी किया था।
कोर्ट में अधिवक्ता निखिल तिवारी ने बताया कि NSA जैसे गंभीर कानून के तहत निरोध की कार्रवाई में रिकॉर्ड की वास्तविकता और प्रत्येक तथ्य का स्वतंत्र परीक्षण बेहद जरूरी है। उन्होंने कोर्ट के समक्ष पुलिस रिकॉर्ड में मौजूद विसंगतियों और कार्रवाई की प्रक्रिया से जुड़े बिंदुओं पर भी पक्ष रखा।
निवारक निरोध असाधारण उपाय, स्वतंत्र संतोष जरूरी
हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अमीना बेगम बनाम तेलंगाना राज्य के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि निवारक निरोध एक असाधारण उपाय है। इसके लिए संबंधित प्राधिकारी का स्वतंत्र और वास्तविक संतोष जरूरी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब निरोध का आधार ही तथ्यात्मक रूप से सही नहीं हो तो कानून का सही इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। डिवीजन बेंच ने माना कि इस मामले में आवश्यक संतोष और स्वतंत्र विवेक का इस्तेमाल दिखाई नहीं देता। इसके चलते जिला मजिस्ट्रेट का 6 जनवरी 2026 का NSA निरोध आदेश रद्द करते हुए दोनों की रिट याचिकाएं स्वीकार कर ली गईं।







