यशभारत संपादकीय…जहरीली शराब का कहर : आखिर कब जागेगा सिस्टम

– आशीष सोनी
सागर जिले के बंडा क्षेत्र में जहरीली शराब पीने से 15 से ज्यादा लोगों की मौत और 80 से ज्यादा लोगों के बीमार होने की घटना केवल एक दर्दनाक हादसा नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था पर गंभीर सवाल है जिसके बीच अवैध शराब का कारोबार फलता-फूलता रहता है। प्रशासन ने फौरी जांच के आधार पर दो थानों में 20 लोगों पर मामले दर्ज किए हैं, जिनमें 2 शराब ठेकेदार भी शामिल है। अब तक दर्जन भर से ज्यादा लोगों को हिरासत में लिया गया है और 3 आबकारी अधिकारी निलम्बित कर दिए गए हैं। आबकारी उपायुक्त को ग्वालियर अटैच करने के साथ दो चौकी प्रभारियों को भी सस्पेंड कर दिया गया है। कई घर के चिराग बुझने के बाद सरकार एक्शन मोड पर तो आ गई लेकिन सवाल यह है कि कार्रवाई हमेशा मौतों के बाद ही क्यों शुरू होती है?
पोस्टमॉर्टम में मिथाइल अल्कोहल के सेवन की आशंका सामने आना बेहद गंभीर संकेत है। मिथाइल अल्कोहल कोई सामान्य मिलावट नहीं, बल्कि जानलेवा जहर है। यदि जांच में इसकी पुष्टि होती है तो यह महज शराब की खराब गुणवत्ता का मामला नहीं रहेगा, बल्कि लोगों की जान से खिलवाड़ करने वाले एक संगठित नेटवर्क की तस्वीर सामने आएगी। शुरुआती जांच में शराब की सप्लाई उत्तर प्रदेश के ललितपुर से होने की बात सामने आई है। यदि यह सच साबित होता है तो सवाल सिर्फ बंडा या सागर तक सीमित नहीं रहेगा। यह अंतरराज्यीय अवैध शराब नेटवर्क की ओर संकेत करेगा। आखिर इतनी बड़ी मात्रा में संदिग्ध शराब सीमा पार से मध्यप्रदेश में कैसे पहुंची? स्थानीय स्तर पर इसे बेचने वाले कौन थे? उन्हें संरक्षण किसका था? और सबसे महत्वपूर्ण यह कि जिम्मेदार विभागों को इसकी भनक क्यों नहीं लगी? जनता यह जानना चाहती है कि इन दुकानों की नियमित निगरानी पहले क्यों नहीं हुई। आबकारी, पुलिस और स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी केवल घटना के बाद सक्रिय होने तक सीमित नहीं हो सकती। अवैध शराब का कारोबार अचानक पैदा नहीं होता। उसके पीछे सप्लाई चैन, स्थानीय विक्रेता, परिवहन और संरक्षण की पूरी व्यवस्था होती है। यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि जिन लोगों ने शराब खरीदी या पी, उन्हें यह जहरीली शराब कहां से मिली। क्या लाइसेंसी दुकानों से शराब की बिक्री हुई या इसके समानांतर कोई अवैध नेटवर्क सक्रिय था? यदि शराब दुकानों के आसपास अवैध बिक्री चल रही थी तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। सरकार को इस मामले में सिर्फ कुछ लोगों को गिरफ्तार करके अपनी जिम्मेदारी पूरी मानने से बचना होगा। जांच ऐसी होनी चाहिए जिसमें सप्लाई करने वाले से लेकर बेचने वाले और संरक्षण देने वाले तक पूरी श्रृंखला सामने आए। यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी की लापरवाही, मिलीभगत या संरक्षण सामने आता है तो उसके खिलाफ भी उतनी ही कठोर कार्रवाई होनी चाहिए जितनी अवैध शराब के कारोबारियों के खिलाफ। आज बंडा में 18 से ज्यादा परिवार उजड़े हैं, कल किसी और जिले में ऐसी घटना हो सकती है। इसलिए सरकार को इसे एक स्थानीय घटना मानकर फाइल बंद नहीं करनी चाहिए। पूरे प्रदेश में अवैध शराब के नेटवर्क की व्यापक जांच, संदिग्ध शराब की तत्काल जांच और आबकारी-पुलिस तंत्र की जवाबदेही तय करने की जरूरत है। असली न्याय तभी होगा जब यह सुनिश्चित किया जाए कि किसी दूसरे परिवार को अपने किसी सदस्य की मौत का कारण जहरीली शराब न सुनना पड़े। जहरीली शराब से हुई मौतें केवल आंकड़े नहीं हैं। हर आंकड़े के पीछे एक परिवार, एक उम्मीद और एक जिंदगी थी। अब सरकार की परीक्षा इस बात की है कि वह मौतों का हिसाब भर रखती है या उन कारणों को भी खत्म करती है, जिन्होंने इन मौतों को संभव बनाया।







