साहब टिके तो गाड़ियां भी दौड़ीं”… रीडर को ही बना दो थाना प्रभारी!” …. मैडम और 420 का अटूट रिश्ता!” ….. सूची आई… और कई चेहरों की रंगत उड़ गई”

साहब टिके तो गाड़ियां भी दौड़ीं”

पुलिस विभाग में इन दिनों नई गाड़ियों से ज्यादा चर्चा उन गाड़ियों के “भाग्य” की रही। पिछले कई दिनों से शहर के तीन थानों के लिए नई गाड़ियों की फाइलें ऐसे घूम रही थीं जैसे शादी में डीजे वाले का भुगतान — “बस हो रहा है… हो रहा है…”।
कहते हैं कि एसपी साहब काफी पहले ही गाड़ियों की औपचारिकता पूरी कर चुके थे, लेकिन विभाग के कुछ “दूरदर्शी गणितज्ञ” इस इंतजार में बैठे थे कि कहीं साहब का तबादला न हो जाए। उधर कुछ सीएसपी साहब लोग भी मन ही मन “चार पहिया योग” साध रहे थे। मामला बिल्कुल वैसा हो गया था — “न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी।”फिर अचानक आईपीएस ट्रांसफर लिस्ट आई। सबकी नजरें मोबाइल स्क्रीन पर ऐसे जमी थीं जैसे रिजल्ट वाले दिन छात्र की। लेकिन हुआ उल्टा… एसपी साहब का नाम लिस्ट में नहीं निकला। बस फिर क्या था, जो गाड़ियां कई दिनों से सरकारी पार्किंग में “ध्यान मुद्रा” में खड़ी थीं, वे अगले ही दिन थानों की शोभा बढ़ाने निकल पड़ीं।
अब विभाग में लोग चुटकी ले रहे हैं कि“ जैसे ही साफ हुआ कि कप्तान साहब फिलहाल मैदान में डटे हैं, वैसे ही रुकी हुई चाबियां घूम गईं।कुल मिलाकर पुलिस महकमे में इन दिनों एक नई कहावत चल निकली है —“साहब मजबूत तो गाड़ी तुरंत मौजूद।”
रीडर को ही बना दो थाना प्रभारी!”

पिछले दिनों हुई क्राइम मीटिंग में कप्तान साहब पूरे रौद्र रूप में नजर आए। लंबे समय बाद चली क्लास में कई थानेदारों के चेहरे ऐसे दिखे मानो अचानक मौखिक परीक्षा शुरू हो गई हो।
इसी दौरान एक मझौले थानेदार से जब उनके कामकाज और कार्रवाई को लेकर सवाल पूछा गया, तो साहब ने बड़ी मासूमियत से पूरा ठीकरा रीडर के सिर फोड़ने की कोशिश कर दी। बस फिर क्या था… कप्तान ने भी तुरंत समझा दिया कि थाना “रीडर संचालित योजना” से नहीं चलता।
सूत्रों की मानें तो कप्तान ने साफ शब्दों में कार्यशैली सुधारने की हिदायत देते हुए बता दिया कि कुर्सी जिम्मेदारी से चलती है, बहानों से नहीं। अब ग्रामीण थाने में पदस्थ यह थानेदार अपने थाने के नाम की तरह ही “मझौले ” कार्यशैली के कारण चर्चा में हैं।महकमे में तो अब चुटकी ली जा रही है —
“अगर हर सवाल का जवाब रीडर देगा, तो अगली मीटिंग में कुर्सी पर भी वही बैठा नजर आएगा!”
मैडम और 420 का अटूट रिश्ता!”

महकमे में इन दिनों एक महिला अधिकारी की कार्यशैली खूब चर्चा में है। शहर की एक चर्चित विधानसभा पर नर्मदा के दोनों घाटों की ओर जाने वाले थानों का मैडम की नजर इतनी तेज है
जैसे किसान की निगाह अपनी पकी फसल पर। खासकर जहां “चार सौ बीसी” की बू आ जाए, वहां मामला सुलझाने में देर नहीं लगती।कहते हैं कि अगर दो पक्ष आपस में तलवारें म्यान में रखकर समझौते की राह पर भी हों, तो मैडम तुरंत बीच में उतरकर ऐसा समाधान करवाती हैं मानो वर्षों पुराना पारिवारिक विवाद निपटा रही हों। उधर मैडम के ऑफिस में मोबाइल ले जाना भी अब किसी वीआईपी सुरक्षा जांच से कम नहीं। मोबाइल प्रतिबंधित होने के बाद जो भी मिलने पहुंचता है, पहले मोबाइल जमा करता है, फिर हाजिरी लगाता है। चर्चा तो यह भी है कि मैडम के साथ कुछ “खिलाड़ी” भी इस पूरे खेल में सक्रिय बताए जाते थे, लेकिन उनकी चालाकियां ज्यादा दिन छिप नहीं सकीं। कहते हैं कि एक बड़े साहब की नजर पड़ते ही सारे खिलाड़ी ऐसे निपटे जैसे बरसात में कच्ची दीवार।अब महकमे में चर्चा है —“मैडम की नजर और 420 का केस… दोनों जहां पड़ जाएं, वहां फिर देर-सवेर समझौता तय मानो।”
सूची आई… और कई चेहरों की रंगत उड़ गई”

पुलिस महकमे में पिछले दिनों तबादला सूची को लेकर ऐसी चर्चाएं थीं मानो हर थाना खुद ही मुख्यालय बन गया हो। कोई कप्तान साहब की विदाई तय बता रहा था, तो कोई नए आने वाले अफसर के दरबार में हाजिरी लगाने की तैयारी में था।
उधर कप्तान साहब भी “दूध का दूध और पानी का पानी” चुपचाप देखते रहे। किसने किस थाली में छेद किया और किसने हवा का रुख देखकर पाला बदला, सबका हिसाब भीतर ही भीतर लिखा जाता रहा।फिर सूची आई… लेकिन कप्तान साहब का नाम गायब था। बस, यहीं से कई अफसरों के “तोते उड़ गए”। जो कल तक ऊंची उड़ान भर रहे थे, अब फाइलों में सिर गड़ाए घूम रहे हैं।अब विभाग में कानाफूसी है कि अब कप्तान तो कहीं नहीं जा रहे इसके बाद कई थाना प्रभारियों का “बोरिया-बिस्तर बंधना” तय माना जा रहा है। आखिर पुलिस महकमे में कहा भी जाता है —
“साहब की खामोशी अक्सर सबसे लंबी कार्रवाई लिखती है।”








