संजय सोनी वो अफसर, जिसके लिए टूटा हुआ दांत बना मुजरिम का डेथ वारंट

संजय सोनी: वो अफसर, जिसके लिए टूटा हुआ दांत बना मुजरिम का डेथ वारंट
यादगार केसः खाकी का चक्रव्यूह और 105 कैमरों का सच
अरविन्द कुमार कपिल
भोपाल, यश भारत। पुलिस की दुनिया में कुछ अफसर फाइलों में जीते हैं, और कुछ केस की रूह में उतर जाते हैं। 2007 सब-इंस्पेक्टर भर्ती के स्टेट टॉपर रहे कोलार थाना प्रभारी संजय सोनी इसी दूसरी श्रेणी के अफसर हैं। सागर की ट्रेनिंग से लेकर ग्वालियर के डबरा-पिछोर की तपिश और भोपाल के जहांगीराबाद जैसे संवदेनशील इलाकों की कमान संभालने तक, उनका करियर किसी थ्रिलर फिल्म की पटकथा जैसा है। लेकिन 24 सितंबर 2024 का कोलार केस उनकी यादों की डायरी का वो पन्ना है, जो तकनीक और तजुर्बे की बेमिसाल मिसाल बन गया।
सीधी बातचीत
प्रश्न 1: संजय जी, आप 2007 बैच के टॉपर रहे। अक्सर कहा जाता है कि किताबी ज्ञान और फील्ड की पुलिसिंग में जमीन-आसमान का अंतर होता है। आपने इस खाई को कैसे पाटा?
संजय सोनी: देखिए, मेरिट लिस्ट में नाम आना एक सम्मान है, लेकिन असली मेरिट तो तब साबित होती है जब आपके पास कोई फरियादी रोता हुआ आए और वो मुस्कुराते हुए थाने से बाहर जाए। ग्वालियर के डबरा और पिछोर जैसे इलाकों में मैंने सीखा कि अपराधी के पास योजना होती है, लेकिन पुलिस के पास धैर्य होना चाहिए। किताबी ज्ञान आपको नियम सिखाता है, लेकिन फील्ड आपको इंसान और हैवान के बीच का फर्क समझाती है।
प्रश्न 2: आपकी सर्विस का सबस यादगार केस कोन सा रहा
संजय सोनी: कोलार का वो 24 सितंबर 2024 का मामला… जिसमें एक 63 वर्षीय वृद्धा शिकार बनी थी। जब ओघटनास्थल पर पहुंचे, तो वो मंजर विचलित करने वाला था। एक निर्माणाधीन मकान, सन्नाटा और एक बेबस मां की चीखें। उस वक्त दिमाग में सिर्फ एक ही बात थी। ये अपराधी बचकर नहीं जाना चाहिए। एक पुलिस अधिकारी के तौर पर हमारी पहली जिम्मेदारी सबूत जुटाना थी, लेकिन एक इंसान के तौर पर उस वक्त खून खौल रहा था। चुनौती बड़ी थी, क्योंकि हमारे पास आरोपी का कोई चेहरा नहीं था, बस एक धुंधला सा साया था।
प्रश्न 3: इस केस में आपने 105 सीसीटीवी कैमरे खंगाले। डिजिटल युग में क्या सस्पेंस अब कैमरों के पीछे सिमट गया है?
संजय सोनी: कैमरे सिर्फ आंखें हैं, दिमाग तो पुलिस का ही चलता है। 105 कैमरों की फुटेज देखना कोई साधारण काम नहीं था। मेरी टीम ने घंटों बिना पलक झपकाए मॉनिटर्स पर बिताए। हमने कोलार के बांसखेड़ी से लेकर बंजारी और कान्हाकुंज तक के हर मोड़, हर दुकान के कैमरे चेक किए। लेकिन असली सफलता तब मिली जब हमने उन कैमरों को पीड़िता के बताए हुलिए से जोड़ा। सफेद शर्ट, काला पैंट और वो सबसे अहम सुराग-दांतों का गैप और एक गायब दांत। अपराधी कपड़े बदल सकता है, लेकिन अपनी कुदरती बनावट नहीं।
प्रश्न 4: क्या आज भी ट्रेडिशनल पुलिसिंग तकनीक से ज्यादा कारगर है?
संजय सोनी: तकनीक हमें आरोपी के करीब ले जाती है, लेकिन उसे पकड़वाता इंसान ही है। हमने इलाके के नशेड़ियों, कबाड़ बीनने वालों और पुराने शातिर बदमाशों की एक लिस्ट बनाई। मैंने साफ संदेश दिया- जो सुराग देगा, उसे इनाम भी मिलेगा और पुलिस का साथ भी। इसी का नतीजा था कि रात के अंधेरे में एक मुखबिर की सटीक सूचना मिली कि स्वर्ण जयंती पार्क के पास एक युवक संदिग्ध हालत में देखा गया है। वहीं से 22 साल के दीपक जाटव की गिरफ्तारी मुमकिन हुई।
प्रश्न 5: सागर, मंडला, ग्वालियर, छतरपुर, रायसेन, भिंड और अब भोपाल। इस लंबी यात्रा में संजय सोनी ने खुद को कितना बदला?
संजय सोनी: समय के साथ तकनीक बदली है, अपराध के तरीके बदले हैं, लेकिन मेरी प्राथमिकता नहीं बदली। मैं आज भी उसी जुनून के साथ अपनी टीम के साथ काम करता हूँ जैसे 2014 में इंस्पेक्टर बनने के समय करता था। ग्वालियर के थानों ने मुझे सख्त बनाया, तो भोपाल ने मुझे कम्युनिटी पुलिसिंग की अहमियत सिखाई। कोलार थाना प्रभारी के रूप में मेरा लक्ष्य सिर्फ अपराध रोकना नहीं, बल्कि अपराधियों के मन में कानून का खौफ पैदा करना है। और जनता के मन में भरोसा पैदा करना है।
प्रश्न 6: अंत में, उन युवाओं के लिए क्या कहेंगे जो आपको अपना आदर्श मानते हैं?
संजय सोनी: सिर्फ एक बात-शॉर्टकट मत खोजिए। तफ्तीश में हर छोटा सुराग बड़ा होता है। जैसे कोलार केस में एक टूटा हुआ दांत अपराधी की तकदीर बन गया, वैसे ही आपकी मेहनत की एक-एक बूंद आपकी सफलता की कहानी लिखेगी।







