आखिरकार राजनीतिक शून्यता की भेंट चढ़ गया जमतरा रेलवे ब्रिज

जबलपुर यश भारत।आखिरकार कुछ दिनों से सुर्खियों मै बने जमतरा के ब्रिटिश कालीन ब्रिज को बुधवार को ढहा दिया गया बताया जाता है कि विरोध के स्वर उठने के बाद काम की रफ्तार को बढ़ा दिया गया और इसके पहले की कोई बड़ा विरोध प्रदर्शन या कुछ और होता उसके पहले ही इसे गिराने की कार्यवाही पूरी कर दी गई। जमतरा का यह ब्रिज वर्ष 1927 में निर्मित किया गया था और 98 साल के बाद आखिरकार इसेआज ध्वस्त कर दिया गया। इन 98 सालों में इस पुल से लोगों की न जाने कितनी स्मृतियां जुड़ी हैं। जिस जमाने में आज की जैसे संसाधन नहीं थे तब यहां से गुजरने वाली नैरोगेज ट्रेन में सफर करने वाली गुजरते थे तो नर्मदा का विहंगम दृश्य और प्राकृतिक वातावरण रेल यात्रियों को अभिभूत कर देता था। नर्मदा उस पार बसे कई गांव के लिए यह किसी वरदान से कम नहीं था इसी के सहारे ग्रामीण कई दशकों तक इसका उपयोग आवागमन के लिए करके आए हैं। लेकिन अब यह अतीत की बात हो गई। शहर की राजनीतिक शून्यता ने एक और धरोहर को खो दिया। वैसे भी पहले राजनीतिक शन्यता के चलते शहर बहुत कुछ खो चुका है यदि शहर के राजनेता और जनप्रतिनिधि लोगों की भावनाओं को समझ कर इसे गंभीरता से ले लेते तो शायद इसी बचाया जा सकता था लेकिन यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि सुर्खियों में आने के बाद भी जनप्रतिनिधि मौन धारण किए रहे। जैसी की जानकारी लगी है कि रेलवे ने इसे जर्जर बताकर अनुपयोगी बताते हुए मात्र 3 करोड रुपए में एक कबाड़ी को बेच दिया और जैसे ही विरोध के स्वर उठने शुरू हुए कबड्डी ने दिन रात एक करके आज से ठिकाने लगा ही दिया। ऐसा नहीं है कि ब्रिटिश कालीन इमारतें या पुल या दूसरे संसाधन आज मौजूद नहीं है और इसका सबसे बड़ा उदाहरण तो है कोलकाता का हावड़ा ब्रिज। रेलवे के पास अपने एक से बढ़कर एक तकनीकी एक्सपर्ट है जिनकी मदद से इसका रखरखाव कर इसे संरक्षित किया जा सकता था लेकिन रेलवे ने तो पहले ही इसे निपटाने का मन बना लिया था। वर्ष 2021 में भी रेलवे के द्वारा एक कोशिश की गई थी लेकिन उस दौरान कांग्रेस ने एक व्यापक प्रदर्शन आंदोलन कर इसे बचा लिया था लेकिन इस बार ऐसा कोई मौका रेलवे के द्वारा दिया ही नहीं जा सका क्योंकि जैसे ही विरोध के स्वर उठने शुरू हुए ताबड़तोड़ काम लगाकर कबाड़ी ने इसे ढहाने का काम शुरू कर दिया और एक बड़ा हिस्सा आज बुधवार को धराशाई कर दिया गया। इस कार्यवाही से वे ग्रामीण आज अपने आप को बहुत दुखी महसूस कर रहे हैं जिनके लिए यह पुल जीवन रेखा था।







